डिलीवरी के एक घंटे बाद थमी सांसें, न रुक सका खून, लापरवाही के आरोपों से गरमाया अस्पताल

खबरी न्यूज नेशनल नेटवर्क डी डी यू नगर ‚ चंदौली।
जिस अस्पताल की पहचान मातृत्व सुरक्षा, नवजीवन और भरोसे से होती है, वहीं राजकीय महिला अस्पताल, मुगलसराय में गुरुवार की देर रात एक ऐसा हृदयविदारक दृश्य सामने आया, जिसने पूरे इलाके को झकझोर कर रख दिया। प्रसव के महज एक घंटे बाद 30 वर्षीय महिला शब्बो की मौत हो गई। आरोप है कि डिलीवरी के बाद अत्यधिक रक्तस्राव हुआ, लेकिन समय रहते न तो समुचित उपचार मिला और न ही गंभीर हालत में रेफर किया गया।
यह घटना सिर्फ एक महिला की मौत नहीं है, बल्कि सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था पर एक बड़ा सवाल बनकर उभरी है। अस्पताल परिसर में देर रात तक कोहराम, चीख-पुकार और आक्रोश का माहौल बना रहा।
रात की शुरुआत, जो मातृत्व की खुशी लेकर आई थी
हरीशंकरपुर गांव निवासी इरशाद की पत्नी शब्बो (उम्र लगभग 30 वर्ष) को गुरुवार की देर रात अचानक प्रसव पीड़ा शुरू हुई। घर में अफरा-तफरी मच गई। परिजन बिना देरी किए शब्बो को मुगलसराय स्थित राजकीय महिला अस्पताल लेकर पहुंचे।
परिजनों के अनुसार, अस्पताल पहुंचने के कुछ समय बाद शब्बो ने एक बच्चे को जन्म दिया। परिवार में खुशी की एक हल्की सी लहर दौड़ी। सबको लगा कि अब सब ठीक हो जाएगा। मां और बच्चा दोनों सुरक्षित होंगे। लेकिन किसी को क्या पता था कि यह खुशी कुछ ही पलों में मातम में बदलने वाली है।


डिलीवरी के बाद नहीं रुका खून, बढ़ती गई बेचैनी
प्रसव के बाद शब्बो की हालत अचानक बिगड़ने लगी। अत्यधिक रक्तस्राव शुरू हो गया। परिजनों का आरोप है कि उन्होंने बार-बार अस्पताल कर्मियों और ड्यूटी पर मौजूद चिकित्सक को स्थिति की गंभीरता बताई, लेकिन उसे सामान्य बताकर टाल दिया गया।
खून लगातार बह रहा था। शब्बो दर्द से तड़प रही थी। उसकी आंखों में डर साफ झलक रहा था। परिजनों का कहना है कि स्वास्थ्य कर्मी भी घबराए हुए दिख रहे थे। कुछ दवाइयां दी गईं, लेकिन रक्तस्राव रुकने का नाम नहीं ले रहा था।
रेफर न करना बना मौत की वजह?
परिजनों का सबसे बड़ा आरोप यही है कि जब महिला की हालत लगातार गंभीर होती जा रही थी, तब भी उसे किसी बड़े अस्पताल या ट्रॉमा सेंटर के लिए रेफर नहीं किया गया।
उनका कहना है कि यदि समय रहते शब्बो को बीएचयू, जिला अस्पताल या किसी उच्च स्तरीय चिकित्सा केंद्र भेज दिया गया होता, तो शायद उसकी जान बचाई जा सकती थी।

परिजन सवाल उठा रहे हैं—
- क्या अस्पताल में ब्लड की पर्याप्त व्यवस्था थी?
- क्या इमरजेंसी में प्रसवोत्तर रक्तस्राव (Postpartum Hemorrhage) से निपटने की तैयारी थी?
- यदि हालत नियंत्रण से बाहर थी, तो रेफर करने में देरी क्यों की गई?
इन सवालों का जवाब फिलहाल किसी के पास नहीं है।
एक घंटे बाद टूट गई सांसों की डोर
इलाज के नाम पर कुछ दवाइयों के बाद भी जब रक्तस्राव नहीं रुका, तो शब्बो की हालत और बिगड़ती चली गई। एक घंटे के भीतर ही उसने दम तोड़ दिया।
मौत की खबर मिलते ही अस्पताल परिसर में कोहराम मच गया। पति इरशाद बदहवास हो गए। परिवार की महिलाएं चीखने-चिल्लाने लगीं। नवजात बच्चा, जिसने अभी दुनिया में आंखें खोली थीं, अपनी मां की ममता से हमेशा के लिए वंचित हो गया।
“यह मौत नहीं, लापरवाही है” – परिजनों का आरोप
परिजनों ने साफ शब्दों में कहा कि यह एक सामान्य मौत नहीं, बल्कि अस्पताल प्रशासन की लापरवाही का नतीजा है।
उनका आरोप है कि—
- डॉक्टरों ने स्थिति की गंभीरता को समय पर नहीं समझा
- सिर्फ दवाइयों के भरोसे महिला को छोड़ दिया गया
- रेफर करने की जरूरत होने के बावजूद कोई कदम नहीं उठाया गया
परिजनों ने अस्पताल प्रशासन के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की है।
सूचना मिलते ही मौके पर पहुंची पुलिस
घटना की सूचना मिलते ही मुगलसराय कोतवाली पुलिस टीम के साथ राजकीय महिला अस्पताल पहुंची। अस्पताल परिसर में तनावपूर्ण माहौल था। पुलिस ने परिजनों को समझाने-बुझाने का प्रयास किया।
पुलिस अधिकारियों ने स्थिति को नियंत्रण में रखा और शव को कब्जे में लेकर आगे की कार्रवाई शुरू की। परिजनों की मांग पर मामले की जांच की बात कही गई है।
स्वास्थ्य व्यवस्था पर उठते सवाल
यह घटना सिर्फ एक परिवार का दुख नहीं है, बल्कि पूरे सिस्टम पर एक करारा तमाचा है। सरकार एक ओर मातृ मृत्यु दर कम करने के दावे करती है, वहीं दूसरी ओर जिला स्तर के सरकारी अस्पतालों में ऐसी घटनाएं बार-बार सामने आ रही हैं।
राजकीय महिला अस्पताल जैसे संस्थानों का उद्देश्य ही सुरक्षित प्रसव और मातृत्व की रक्षा है। यदि वहीं महिलाएं सुरक्षित नहीं हैं, तो आम जनता किस पर भरोसा करे?
प्रसवोत्तर रक्तस्राव: एक गंभीर लेकिन नियंत्रित होने वाली स्थिति
चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार, डिलीवरी के बाद अत्यधिक रक्तस्राव एक ज्ञात मेडिकल इमरजेंसी है, जिसे समय रहते इलाज और रेफरल से नियंत्रित किया जा सकता है।
ऐसे मामलों में—
- तुरंत ब्लड ट्रांसफ्यूजन
- विशेषज्ञ चिकित्सक की निगरानी
- उच्च स्तरीय केंद्र में रेफर
ये सभी कदम जीवन रक्षक साबित हो सकते हैं।
नवजात के भविष्य पर भी संकट
शब्बो की मौत के बाद सबसे बड़ा सवाल उस नवजात बच्चे के भविष्य को लेकर है। मां की ममता, देखभाल और पोषण से वंचित यह बच्चा अब परिवार की जिम्मेदारी बन गया है।
परिवार पहले से ही साधनहीन बताया जा रहा है। ऐसे में सरकार और प्रशासन से सहायता की मांग भी उठ रही है।
जांच की मांग, कार्रवाई का इंतजार
फिलहाल अस्पताल प्रशासन की ओर से कोई स्पष्ट बयान सामने नहीं आया है। न ही यह साफ किया गया है कि महिला की मौत किन परिस्थितियों में हुई और क्या चिकित्सा मानकों का पालन किया गया था।
परिजन और स्थानीय लोग पूरे मामले की निष्पक्ष जांच और दोषियों पर सख्त कार्रवाई की मांग कर रहे हैं।
ख़बरी न्यूज़ की मांग
ख़बरी न्यूज़ यह सवाल उठाता है कि—
- कब तक गरीब और ग्रामीण महिलाओं को स्वास्थ्य व्यवस्था की लापरवाही की कीमत अपनी जान देकर चुकानी पड़ेगी?
- कब जवाबदेही तय होगी?
- कब सरकारी अस्पतालों में “रेफरल में देरी” मौत का कारण बनना बंद होगी?
यह मामला सिर्फ एक खबर नहीं, बल्कि सिस्टम की सच्चाई है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
(ख़बर जारी है… जांच के बाद और तथ्य सामने आने की संभावना)


