मीडिया ट्रस्ट ऑफ इंडिया व खबरी न्यूज की संवेदनशील पहल ने पुण्यतिथि को बना दिया सामाजिक संकल्प का दिन

खबरी न्यूज नेशनल नेटवर्क चकिया‚चंदौली।
कुछ लोग भीड़ में भी अलग दिखते हैं।
कुछ लोग नाम से नहीं, अपने काम से पहचाने जाते हैं।
और कुछ लोग ऐसे होते हैं, जो देह छोड़ने के बाद भी समाज को दिशा देते रहते हैं।
स्वर्गीय वशिष्ठ चौबे ऐसे ही लोगों में थे।
इसरगोडवा गाँव में उनकी प्रथम पुण्यतिथि सिर्फ एक धार्मिक या औपचारिक आयोजन नहीं रही, बल्कि वह दिन बन गया — संवेदना, सेवा और समाज को दिशा देने वाले मूल्यों की पुनः स्मृति का दिन। मीडिया ट्रस्ट ऑफ इंडिया और खबरी न्यूज के संयुक्त प्रयास से यह आयोजन एक ऐसी वेव स्टोरी बन गया, जिसने गांव से लेकर सोशल मीडिया तक लोगों को सोचने पर मजबूर कर दिया।


पुण्यतिथि या प्रेरणा-दिवस? जब यादें सेवा में बदल गईं
अक्सर पुण्यतिथियों पर फोटो लगते हैं, माला चढ़ती है और दो शब्द बोलकर लोग आगे बढ़ जाते हैं।
लेकिन इसरगोडवा में जो हुआ, वह अलग था।
यहां पुण्यतिथि को सेवा में बदला गया।
ठंडी सुबह, गांव की गलियां, बुजुर्गों की कंपकंपाती हथेलियां और उनके कंधों पर रखे गए गर्म कंबल — यह दृश्य सिर्फ राहत का नहीं था, यह उस सोच का प्रतीक था जो वशिष्ठ चौबे अपने जीवन में जीते रहे।
मीडिया ट्रस्ट ऑफ इंडिया और खबरी न्यूज ने यह साफ कर दिया कि
👉 याद वही सच्ची है, जो किसी के जीवन को थोड़ा आसान बना दे।


तैल चित्र, वैदिक मंत्र और सन्नाटा — जब पूरा गांव कुछ पल के लिए ठहर गया
कार्यक्रम की शुरुआत स्व. वशिष्ठ चौबे के तैल चित्र पर पुष्पांजलि और वैदिक मंत्रोच्चारण से हुई।
मंत्रों की गूंज के बीच एक अजीब सा सन्नाटा था — भावनाओं का सन्नाटा।
ऐसा लग रहा था मानो गांव कह रहा हो:
“आप चले गए, लेकिन जो रास्ता दिखाया, वह आज भी हमारे सामने है।”
यह कोई दिखावटी श्रद्धांजलि नहीं थी। यह अंतरात्मा से निकली श्रद्धा थी।
वशिष्ठ चौबे: समाजसेवी नहीं, समाज के पथ-प्रदर्शक
वशिष्ठ चौबे को सिर्फ समाजसेवी कहना उनके कद को छोटा करना होगा।
वह समाज के पथ-प्रदर्शक थे।
- जो बोलने से पहले सोचते थे
- जो मदद को प्रचार नहीं बनने देते थे
- जो हर वर्ग, हर उम्र, हर जरूरत को बराबर देखते थे
गांव के लोग आज भी कहते हैं:
“बाबूजी कभी सामने नहीं आते थे, लेकिन जब जरूरत होती थी, सबसे पहले वही खड़े मिलते थे।”
यही कारण है कि उनकी पुण्यतिथि पर भीड़ नहीं, भावना उमड़ी।

डॉ. परशुराम सिंह ने कहा : “ऐसे लोग विरले होते हैं”
डॉ. परशुराम सिंह ने मंच से जो कहा, वह सिर्फ भाषण नहीं था, वह अनुभव था:
“वशिष्ठ चौबे जी ने समाज को सिखाया कि पद नहीं, प्रवृत्ति बड़ी होती है।
आज मीडिया ट्रस्ट ऑफ इंडिया और खबरी न्यूज ने जिस तरह उनकी पुण्यतिथि को सेवा से जोड़ा है, वह उनके जीवन दर्शन का सच्चा प्रतिबिंब है।”

डॉ. गीता शुक्ला: “कंबल नहीं, सम्मान बांटा गया”
डॉ. गीता शुक्ला ने कहा:
“यह सिर्फ कंबल वितरण नहीं है। यह उन लोगों को सम्मान देना है, जिन्हें समाज अक्सर नजरअंदाज कर देता है।
वशिष्ठ चौबे की सोच यही थी — और आज वही सोच जमीन पर उतरी है।”
उनकी बातों पर कई बुजुर्गों की आंखें भर आईं।

डॉ. विनय तिवारी का सीधा सवाल: “क्या मीडिया सिर्फ खबर दिखाए?”
डॉ. विनय तिवारी की बाइट ने माहौल को गंभीर कर दिया:
“आज मीडिया पर सवाल उठते हैं, लेकिन मीडिया ट्रस्ट ऑफ इंडिया और खबरी न्यूज यह साबित करते हैं कि मीडिया चाहे तो समाज का सबसे मजबूत स्तंभ बन सकता है।
यह आयोजन एक जवाब है — उन तमाम सवालों का।”
गांव की आवाज: ‘हमने बाबूजी को कभी भाषण देते नहीं देखा’
श्रीनाथ तिवारी, लक्ष्मीकांत पाण्डेय, विनोद पाण्डेय जैसे ग्रामीणों ने एक सुर में कहा:
“हमने बाबूजी को मंचों पर नहीं देखा, लेकिन संकट में हमेशा देखा।”
डॉ. विनय प्रकाश तिवारी और उपेंद्र पाण्डेय ने कहा कि
यह आयोजन नई पीढ़ी के लिए पाठशाला है — सेवा की।
प्रधान ने कहा “गांव का सिर ऊंचा हुआ”
ग्राम प्रधान उपेन्द्र पाण्डेय ने कहा:
“आज इसरगोडवा सिर्फ एक गांव नहीं, एक उदाहरण बना है।
मीडिया ट्रस्ट ऑफ इंडिया और खबरी न्यूज ने गांव की भावनाओं को मंच दिया है।”
जब नाम पीछे रह गया, काम आगे आया
शिवशंकर चौबे‚रामप्यारे चौबे‚रामयश चौबे‚सीताराम चौबे ‚श्री नाथ तिवारी लक्ष्मीकांत पाण्डेय‚ विनोद पाण्डेय‚ उपेंद्र पाण्डेय प्रधान‚ सोनल पाण्डेय‚‚ मोनाल पाण्डेय विनय पाण्डेय ‚राहुल‚‚ विनीत दुबे प्रधान डब्बु तिवारी‚ बहादुर तिवारी‚ आर्यन चौबे‚ कुंज चौबे सहित सैकड़ों लोग मौजूद रहे।
कोई सेल्फी नहीं, कोई दिखावा नहीं —
बस एक साझा भाव: सेवा।


खबरी न्यूज मॉडल: जहां खबर नहीं, कहानी बोलती है
यह पूरी रिपोर्ट खबरी वेव पोर्टल स्टाइल का उदाहरण है —
जहां खबर सूखी नहीं होती,
जहां नाम नहीं, मूल्य चलते हैं।
मीडिया ट्रस्ट ऑफ इंडिया और खबरी न्यूज ने यह दिखा दिया कि
👉 वेव पोर्टल सिर्फ ट्रैफिक नहीं, विश्वास भी बनाता है।
खबरी न्यूज का संकल्प
वशिष्ठ चौबे अब हमारे बीच नहीं हैं।
लेकिन उनका रास्ता, उनकी सोच, उनका संस्कार —
आज भी इसरगोडवा की गलियों में जिंदा है।
उनकी प्रथम पुण्यतिथि पर हुआ यह आयोजन
👉 एक खबर नहीं
👉 एक कहानी नहीं
👉 बल्कि एक सामाजिक संकल्प है।

