के सी श्रीवास्तव एड० इडिटर इन चीफ खबरी न्यूज

दूसरी किस्त——अगली बार आप को मिलेगा तीसरी किस्त नई पडताल के साथ
- नौगढ़ के जंगलों का सच: जमीन कम, पौधरोपण ज्यादा!
- कागज़ों में उगी हरियाली या जमीन पर गायब जंगल?
- 23 साल में 90 हजार हेक्टेयर पौधरोपण का दावा सवालों के घेरे में
- 200 करोड़ खर्च… लेकिन जंगल कहां?
- जंगल सिकुड़ते गए और रिपोर्टों में बढ़ती गई हरियाली
- अवैध कब्जों से घिरा जंगल, आंकड़ों में हरा-भरा विभाग
- नौगढ़ के जंगलों की कहानी: कागज बनाम जमीन
- वन भूमि 35 हजार हेक्टेयर, पौधरोपण 90 हजार – कैसे?
- पर्यावरणविद ने खोली वन विभाग की पोल
- जंगल बचेंगे या सिर्फ रिपोर्टों में रह जाएंगे?

जब जंगल सिमटने लगते हैं, तब सिर्फ पेड़ नहीं कटते… भविष्य भी कटता है
नौगढ़ की पहाड़ियों पर सुबह की धूप जब जंगल की पत्तियों से छनकर गिरती है, तो ऐसा लगता है मानो प्रकृति खुद धरती को आशीर्वाद दे रही हो। कभी यही जंगल चंदौली और सोनभद्र की सीमा तक फैले हरे समंदर की तरह दिखाई देते थे। हवा में पत्तियों की सरसराहट, पक्षियों का कलरव और दूर पहाड़ियों के बीच बहती नदियों की आवाज़—यह सब मिलकर उस प्राकृतिक धरोहर की कहानी कहते थे, जिसे पीढ़ियों ने संजोकर रखा।
लेकिन आज वही जंगल एक बड़े सवाल के केंद्र में है।
एक ऐसा सवाल, जो सिर्फ वन विभाग से नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम से जवाब मांग रहा है।
पर्यावरणविद और उच्च न्यायालय में वन अतिक्रमण के खिलाफ मुकदमा दायर करने वाले बलिराम सिंह उर्फ गोबिंद सिंह ने एक ऐसा आरोप लगाया है, जिसने पूरे काशी वन्यजीव प्रभाग रामनगर की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
उनका कहना है कि पिछले 23 वर्षों में वन विभाग ने लगभग 90 हजार हेक्टेयर भूमि में पौधरोपण का दावा किया है, जबकि वास्तविकता यह है कि विभाग के अधीन करीब 35 हजार हेक्टेयर भूमि में ही जंगल बचा है।
यह सवाल सिर्फ आंकड़ों का नहीं है।
यह सवाल उस सच्चाई का है, जो जंगलों की मिट्टी में दबी है।

आंकड़ों का गणित: जमीन कम, पौधरोपण ज्यादा – आखिर कैसे?
बलिराम सिंह द्वारा महालेखाकार, भारत सरकार को भेजे गए पत्र में जो तथ्य सामने आए हैं, वे चौंकाने वाले हैं।
काशी वन्यजीव प्रभाग रामनगर के अभिलेखों के अनुसार:
- कुल वन भूमि : 83,978 हेक्टेयर
- अवैध अतिक्रमण : लगभग 40,000 हेक्टेयर
- जलाशयों और अन्य परियोजनाओं में उपयोग : करीब 6,800 हेक्टेयर
- टसर/रेशम उत्पादन हेतु दी गई भूमि : 700 हेक्टेयर
- सड़क, भवन और अन्य निर्माण : 1,300 हेक्टेयर
इन सबको जोड़कर देखा जाए तो वर्तमान में करीब 35,178 हेक्टेयर भूमि ही बचती है, जहां वास्तविक जंगल खड़ा है।
अब सवाल उठता है—
जब जंगल की जमीन ही 35 हजार हेक्टेयर है, तो 90 हजार हेक्टेयर में पौधरोपण कैसे हो गया?
क्या यह वही “कागज़ी हरियाली” है, जो हर साल रिपोर्टों में चमकती है लेकिन जमीन पर दिखाई नहीं देती?
23 वर्षों का पौधरोपण: आंकड़ों की परतें खोलती कहानी
वन विभाग के अभिलेखों के अनुसार 2002 से 2024 के बीच लगभग 90 हजार हेक्टेयर भूमि में पौधरोपण कराया गया है।
यह आंकड़ा अगर सच है, तो इसका मतलब यह है कि नौगढ़ के जंगलों में पिछले दो दशकों में हरियाली का एक विशाल समुद्र खड़ा हो जाना चाहिए था।
लेकिन हकीकत कुछ और ही कहानी कहती है।
स्थानीय ग्रामीण बताते हैं कि कई जगहों पर जहां पौधरोपण दिखाया गया है, वहां आज भी या तो बंजर जमीन है या खेती हो रही है।
कई स्थानों पर तो लोगों को यह भी याद नहीं कि वहां कभी पौधे लगाए गए थे।


जायका परियोजना: 200 करोड़ की हरियाली का हिसाब कौन देगा?
वनों के विकास और हरियाली बढ़ाने के लिए 2011 से 2015 के बीच ‘जायका परियोजना’ के तहत करीब 200 करोड़ रुपये खर्च किए गए।
यह परियोजना कागज़ों में बेहद महत्वाकांक्षी थी।
लक्ष्य था—
- जंगलों की हरियाली बढ़ाना
- वन्यजीवों के लिए बेहतर आवास बनाना
- पर्यावरण संतुलन को मजबूत करना
लेकिन आज सवाल यह है कि इतनी बड़ी राशि खर्च होने के बाद जंगलों की स्थिति में कितना बदलाव आया?
क्या यह पैसा सच में हरियाली में बदला या सिर्फ फाइलों की मोटाई बढ़ाने में खर्च हो गया?
अवैध अतिक्रमण: जंगल की जमीन पर बढ़ते कदम
नौगढ़ और आसपास के क्षेत्रों में वर्षों से एक और गंभीर समस्या बढ़ती रही है—अवैध अतिक्रमण।
बलिराम सिंह का आरोप है कि काशी वन्यजीव प्रभाग की लगभग 48 हजार हेक्टेयर भूमि पर अवैध कब्जा हो चुका है।
इन कब्जों में शामिल हैं:
- खेती
- मकान निर्माण
- छोटे-छोटे बाजार
- निजी उपयोग के निर्माण
यह सिर्फ जमीन का कब्जा नहीं है।
यह जंगल की आत्मा पर कब्जा है।


सरकारी दावे बनाम जमीनी सच्चाई
प्रदेश सरकार हर साल 30 करोड़ पौधे लगाने का दावा करती है।
हर वर्ष मानसून आते ही बड़े-बड़े अभियान चलाए जाते हैं—
- मंत्री
- अधिकारी
- जनप्रतिनिधि
- स्कूल के बच्चे
सब मिलकर पौधे लगाते दिखाई देते हैं।
तस्वीरें खिंचती हैं।
समाचार बनते हैं।
रिपोर्टें तैयार होती हैं।
लेकिन कुछ महीनों बाद वही पौधे कहां चले जाते हैं—यह सवाल शायद ही कभी पूछा जाता है।
महालेखाकार से जांच की मांग
इन्हीं सवालों को लेकर बलिराम सिंह उर्फ गोबिंद सिंह ने महालेखाकार, भारत सरकार को पत्र भेजा है।
उन्होंने मांग की है कि:
- पिछले 23 वर्षों के पौधरोपण कार्यों की स्थलीय जांच हो
- उच्च स्तरीय अधिकारियों की टीम बनाई जाए
- वास्तविक स्थिति का आकलन किया जाए
यह सिर्फ एक व्यक्ति की मांग नहीं है।
यह उस समाज की मांग है, जो अपने जंगलों को बचाना चाहता है।
जंगल क्यों जरूरी हैं?
जंगल सिर्फ पेड़ों का समूह नहीं होते।
वे होते हैं—
- बारिश का आधार
- नदियों का स्रोत
- वन्यजीवों का घर
- ग्रामीणों की जीवनरेखा
नौगढ़ और चंदौली के जंगलों ने सदियों से इस क्षेत्र को जीवन दिया है।
अगर ये जंगल खत्म हो गए, तो इसका असर सिर्फ पर्यावरण पर नहीं बल्कि पूरे समाज पर पड़ेगा।


खबरी न्यूज की पड़ताल: सवाल जो जवाब मांगते हैं
खबरी न्यूज की यह मेगा रिपोर्ट कुछ महत्वपूर्ण सवाल सामने रखती है—
- क्या वास्तव में 23 वर्षों में 90 हजार हेक्टेयर में पौधरोपण हुआ?
- अगर हुआ तो वह हरियाली जमीन पर कहां है?
- 200 करोड़ की जायका परियोजना का वास्तविक परिणाम क्या है?
- अवैध अतिक्रमण रोकने में वन विभाग क्यों असफल रहा?
- क्या इन सबकी निष्पक्ष जांच होगी?
भावनात्मक सच: जंगल बचेंगे तो ही भविष्य बचेगा
नौगढ़ की पहाड़ियों पर खड़े बूढ़े पेड़ शायद यह सब देख रहे हैं।
वे जानते हैं कि अगर जंगल खत्म हो गए, तो आने वाली पीढ़ियां सिर्फ किताबों में जंगल देखेंगी।
आज जरूरत है—
- सच्चाई सामने लाने की
- जिम्मेदारी तय करने की
- जंगलों को बचाने की
क्योंकि जंगल सिर्फ प्रकृति नहीं हैं।
वे हमारे अस्तित्व का हिस्सा हैं।
एडिटर-इन-चीफ का संक्षिप्त विचार
के. सी. श्रीवास्तव (एडवोकेट)
“जंगलों का सवाल सिर्फ वन विभाग का नहीं, बल्कि पूरे समाज का है। यदि पौधरोपण के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च हो रहे हैं और जमीन पर हरियाली दिखाई नहीं दे रही, तो यह गंभीर चिंता का विषय है। आवश्यकता है पारदर्शिता, जवाबदेही और ईमानदार जांच की, ताकि प्रकृति के साथ न्याय हो सके।”
✔ खबरी न्यूज की अपील:
जंगल बचाइए… क्योंकि जब जंगल बचेंगे, तभी भविष्य बचेगा।

