
Khabari News | चकिया‚चन्दौली।
विशेष संवाददाता
पचवनिया गांव के खेतों में इन दिनों केवल गेहूं की फसल ही नहीं, बल्कि किसानों की चिंता भी लहलहा रही है। जिस समय गेहूं की फसल को सबसे अधिक पानी की जरूरत थी, उसी समय गांव की नहर व्यवस्था बाधित हो गई। कारण बना—पुराने पुल को तोड़कर उसी अवधि में शुरू किया गया पुनर्निर्माण कार्य।
यह फैसला आज किसानों के लिए भारी पड़ता नजर आ रहा है।
यह मामला अब सिर्फ सिंचाई संकट तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि योजना की टाइमिंग, प्रशासनिक समन्वय और निर्माण कार्य की गुणवत्ता पर भी बड़े सवाल खड़े कर रहा है।
गलत समय, गलत फैसला? किसानों की पहले ही थी चेतावनी
Khabari News से बातचीत में स्थानीय किसानों ने बताया कि जब गेहूं की बुवाई शुरू हुई, उसी समय पुराने पुल को तोड़ने और उसके पुनर्निर्माण का कार्य आरंभ कर दिया गया।
किसानों ने तभी आपत्ति जताई थी कि यह समय पुल तोड़ने का नहीं है। उनका कहना था कि नहर आधारित सिंचाई ही उनकी फसल का एकमात्र सहारा है।
इसके बावजूद काम जारी रहा और कुछ ही दिनों में नहर की आपूर्ति बाधित हो गई। धीरे-धीरे हालात ऐसे बने कि नहर पूरी तरह बंद हो गई और खेतों तक पानी पहुंचना रुक गया।
डेढ़ महीने पुरानी गेहूं की फसल, पानी के बिना हांफती खेती
गांव के कई किसान ऐसे हैं जिनकी गेहूं की बुवाई लगभग डेढ़ महीने पहले हो चुकी थी। इस अवस्था में फसल को नियमित और पर्याप्त सिंचाई की आवश्यकता होती है।
नहर बंद होते ही खेतों में नमी की कमी साफ दिखाई देने लगी।
किसानों का कहना है कि उन्होंने बीज, खाद, जुताई और मजदूरी पर हजारों रुपये खर्च किए हैं। ऐसे में सिंचाई रुकने से पूरी मेहनत बर्बाद होने का डर सताने लगा है।
कुछ किसान निजी पंपसेट से सिंचाई करने में सक्षम हैं, लेकिन अधिकांश छोटे और सीमांत किसानों के पास यह विकल्प भी नहीं है।

जब हालात बिगड़े, तब अपनाया गया Plan-B
स्थिति लगातार गंभीर होती देख सिंचाई विभाग को आखिरकार Plan-B अपनाना पड़ा।
Plan-B के तहत नहर के किनारों पर बोरियों में बालू भरकर अस्थायी बांध बनाया जा रहा है। इसके साथ ही नहर में सीमित मात्रा में पानी धीरे-धीरे छोड़े जाने की तैयारी की जा रही है।
विभाग का तर्क है कि इससे किसान पंपसेट लगाकर किसी तरह गेहूं की सिंचाई कर सकेंगे और फसल को पूरी तरह बर्बाद होने से बचाया जा सकेगा।
अस्थायी राहत, स्थायी समाधान नहीं
हालांकि किसान इस बात से इनकार नहीं कर रहे कि Plan-B से उन्हें कुछ राहत मिली है, लेकिन उनका स्पष्ट कहना है कि यह सिर्फ जुगाड़ है, समाधान नहीं।
बोरियों और बालू से बनाई गई यह अस्थायी व्यवस्था कब तक टिकेगी, इसे लेकर खुद किसान भी आशंकित हैं।
उनका कहना है कि यदि जल्द ही स्थायी और तकनीकी रूप से मजबूत समाधान नहीं किया गया, तो आगे चलकर फिर से नहर बाधित हो सकती है और फसल पर दोबारा संकट खड़ा हो जाएगा।
निर्माण की गुणवत्ता पर उठे गंभीर सवाल
सिंचाई संकट के बीच अब निर्माण कार्य की गुणवत्ता को लेकर भी सवाल उठने लगे हैं।
ग्रामीणों और किसानों का आरोप है कि निर्माण कार्य की शुरुआत में नीचे का काम अपेक्षाकृत ठीक और संतुलित तरीके से किया गया था, लेकिन जैसे-जैसे निर्माण ऊपर की ओर बढ़ा, गुणवत्ता में भारी गिरावट नजर आने लगी।
कहीं ऊंचाई अधिक दिखाई दे रही है, तो कहीं कम। पूरा निर्माण ढांचा टेढ़ा-मेढ़ा प्रतीत हो रहा है, जिससे इसकी मजबूती और भविष्य की सुरक्षा पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
“नीचे ठीक, ऊपर बिगड़ा”—किसानों की सीधी शिकायत
Khabari News से बातचीत में किसानों ने कहा,
“नीचे तक काम सही लग रहा था, लेकिन ऊपर आते ही कहीं ज्यादा ऊंचा, कहीं बहुत नीचे बना दिया गया। अगर यही हाल रहा तो आगे चलकर फिर समस्या खड़ी होगी।”
किसानों का मानना है कि जल्दबाजी और निगरानी की कमी के कारण निर्माण कार्य में यह असमानता आई है।


भविष्य की चिंता: कहीं दोबारा न बने संकट
ग्रामीणों को डर है कि यदि इस तरह का टेढ़ा-मेढ़ा निर्माण पूरा कर दिया गया, तो भविष्य में न सिर्फ पुल बल्कि नहर व्यवस्था भी बार-बार प्रभावित हो सकती है।
उनकी मांग है कि निर्माण कार्य की तकनीकी जांच कराई जाए और गुणवत्ता से कोई समझौता न किया जाए।
प्रशासनिक समन्वय की कमी आई सामने
यह पूरा मामला प्रशासनिक समन्वय की कमी को भी उजागर करता है।
यदि निर्माण एजेंसी, सिंचाई विभाग और स्थानीय प्रशासन के बीच बेहतर तालमेल होता, तो फसल के संवेदनशील समय में यह कार्य टाला जा सकता था या वैकल्पिक व्यवस्था पहले से की जा सकती थी।
किसानों की मांगें साफ
पचवनिया के किसान अब केवल आश्वासन नहीं, बल्कि ठोस कार्रवाई चाहते हैं। उनकी प्रमुख मांगें हैं—
- नहर की स्थायी सिंचाई व्यवस्था जल्द बहाल की जाए
- निर्माण कार्य की गुणवत्ता की स्वतंत्र जांच कराई जाए
- भविष्य में फसल चक्र को ध्यान में रखकर ऐसे कार्य किए जाएं
किसानों का कहना है कि वे विकास के विरोधी नहीं हैं, लेकिन विकास की कीमत उनकी फसल और रोज़ी-रोटी नहीं होनी चाहिए।
यह सिर्फ पचवनिया नहीं, ग्रामीण भारत की तस्वीर
Khabari News की पड़ताल में यह साफ होता है कि पचवनिया की यह समस्या अकेली नहीं है।
ग्रामीण इलाकों में अक्सर विकास कार्यों की योजना बनाते समय खेती और किसानों की जरूरतों को नजरअंदाज कर दिया जाता है, जिसका खामियाजा सीधे अन्नदाता को भुगतना पड़ता है।
Khabari News का सवाल
- क्या समय पर सही योजना बनती, तो यह संकट टल सकता था?
- क्या अस्थायी जुगाड़ से किसानों की मेहनत सुरक्षित हो पाएगी?
- क्या निर्माण गुणवत्ता पर जिम्मेदारों की जवाबदेही तय होगी?
खबरी की ओपनिंग: Plan-B से मिली मोहलत, जवाब अभी बाकी
फिलहाल Plan-B के जरिए नहर में पानी छोड़ने की तैयारी ने किसानों को थोड़ी राहत जरूर दी है, लेकिन असली परीक्षा अभी बाकी है।
पचवनिया के खेत आज भी स्थायी समाधान और जिम्मेदारों से जवाब का इंतजार कर रहे हैं।
Khabari News इस पूरे मामले पर लगातार नजर बनाए रखेगा।ॽ


