बृजेश केशरी नौगढ
खबरी न्यूज नेशनल नेटवर्क नौगढ़ चंदौली ।
यह कहानी किसी एक गांव की नहीं है, यह कहानी उस भरोसे की है जो हर चुनाव में जनता अपने जनप्रतिनिधि को सौंपती है। यह कहानी है औरवाटांड़ गांव की—जहां आज़ादी के सात दशक बाद भी बिजली एक सपना है और जहां जनसुनवाई केवल भाषणों तक सीमित होकर रह गई है।

जब वादे लिखे गए थे उम्मीदों की किताब में…
विधानसभा चकिया के विधायक कैलाश खरवार ने औरवाटांड़ गांव में बिजली पहुंचवाने तथा नौगढ़ में प्रत्येक माह की 1 और 15 तारीख को स्वयं उपस्थित रहकर जनसुनवाई करने का सार्वजनिक आश्वासन दिया था। उस दिन गांव के लोगों की आंखों में उम्मीद थी—कि अब अंधेरे से मुक्ति मिलेगी, कि अब समस्याएं सुनी जाएंगी, कि अब शासन–प्रशासन तक उनकी आवाज पहुंचेगी।
लेकिन आज वही गांव, वही लोग, वही समस्याएं—और वादे केवल स्मृति बनकर रह गए हैं।
अंधेरा सिर्फ रात का नहीं, व्यवस्था का भी है
औरवाटांड़ गांव आज भी बिजली विहीन है।
जब सूर्य अस्त होता है, तो गांव पर केवल अंधेरा नहीं उतरता—
बल्कि डर, असुरक्षा और बेबसी भी उतरती है।
ग्रामीण बताते हैं कि—
- रात में जंगली जानवरों का भय बना रहता है
- बच्चों की पढ़ाई मोमबत्ती और ढिबरी के सहारे होती है
- मोबाइल चार्ज कराना भी एक बड़ी चुनौती है
- बीमार व्यक्ति को रात में अस्पताल ले जाना जोखिम भरा हो जाता है
आधुनिक भारत के डिजिटल युग में, जब “हर घर बिजली” का नारा दिया जा रहा है, तब औरवाटांड़ गांव के लोग खुद से पूछते हैं—
“क्या हम भारत का हिस्सा नहीं हैं?”
बच्चों का भविष्य अंधेरे में क्यों?
गांव के अभिभावकों की पीड़ा सबसे गहरी है।
बिजली के अभाव में—
- बच्चे ठीक से पढ़ नहीं पा रहे
- ऑनलाइन शिक्षा, डिजिटल क्लास जैसी बातें यहां मज़ाक लगती हैं
- प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करना लगभग असंभव है
एक ग्रामीण पिता की आवाज कांप जाती है जब वह कहता है—
“साहब, हमारे बच्चे भी कुछ बनना चाहते हैं… लेकिन अंधेरे में सपना कैसे देखा जाए?”
जनसुनवाई: वादा था, व्यवस्था नहीं बनी
विधायक द्वारा किया गया दूसरा बड़ा वादा था—
हर माह की 1 और 15 तारीख को नौगढ़ में उपस्थित रहकर जनसमस्याएं सुनना और समाधान कराना।
लेकिन हकीकत यह है कि—
- तय तारीखों पर विधायक की उपस्थिति नहीं होती
- जनसुनवाई नियमित रूप से आयोजित नहीं हो रही
- समस्याएं लिखित रूप में देने के बाद भी लंबित हैं
ग्रामीणों और क्षेत्रीय कार्यकर्ताओं का कहना है कि
“जब जनप्रतिनिधि ही सामने नहीं आएंगे, तो हमारी फरियाद कौन सुनेगा?”


आक्रोश नहीं, सवाल है
यह खबर किसी राजनीतिक द्वेष से नहीं, बल्कि जन सरोकार से जुड़ी है।
औरवाटांड़ के लोग आज सड़क पर उतरकर नारे नहीं लगा रहे—
वे केवल सवाल पूछ रहे हैं—
- बिजली कब मिलेगी?
- जनसुनवाई कब नियमित होगी?
- दिए गए वादों की जवाबदेही कौन तय करेगा?
विश्वास टूटता है तो लोकतंत्र कमजोर होता है
लोकतंत्र केवल वोट डालने से नहीं चलता,
लोकतंत्र चलता है वादों की पूर्ति से।
जब जनप्रतिनिधि अपने ही वचनों को भूल जाते हैं, तो—
- जनता का विश्वास टूटता है
- प्रशासनिक व्यवस्था पर प्रश्न उठते हैं
- और लोकतंत्र की जड़ें कमजोर होती हैं
औरवाटांड़ गांव आज इसी टूटे विश्वास की तस्वीर बन चुका है।

ग्रामीणों की स्पष्ट मांग
गांव के लोगों ने एक स्वर में मांग की है कि—
- औरवाटांड़ गांव में शीघ्र बिजली व्यवस्था सुनिश्चित की जाए
- नौगढ़ में प्रत्येक माह 1 और 15 तारीख को नियमित जनसुनवाई आयोजित की जाए
- विधायक स्वयं उपस्थित रहकर समस्याएं सुनें और समाधान सुनिश्चित कराएं
- जनता से किए गए वादों को निभाकर विश्वास बहाल किया जाए
अब भी समय है…
यह खबर चेतावनी नहीं, आह्वान है।
अब भी समय है कि—
- विधायक अपने वादों को याद करें
- अंधेरे में जी रहे गांव तक विकास की रोशनी पहुंचे
- जनसुनवाई को औपचारिकता नहीं, संवेदनशीलता बनाया जाए
क्योंकि सत्ता का असली मूल्य
जनता की पीड़ा समझने में है, न कि केवल मंचों से भाषण देने में।
खबरी न्यूज़ वेव पोर्टल आपसे सवाल पूछता है—
औरवाटांड़ गांव में बिजली कब जलेगी?
जनसुनवाई की तारीखें फिर से कैलेंडर पर कब दिखेंगी?
जब तक इन सवालों के जवाब नहीं मिलते,
यह आवाज़ उठती रहेगी…
क्योंकि अंधेरे को उजाले से जवाब देना ही सच्ची राजनीति है।


