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पूरी तरह बंद चकिया रोडवेज बस स्टेशन: विकास के दावों पर करारा तमाचा, जनता मजबूर, जिम्मेदार मौन

पहली किस्त …….

खबरी न्यूज नेशनल नेटवर्क चकिया‚चन्दौली।

SRVS Sikanderpur

न बस, न टिकट, न यात्री—चकिया रोडवेज स्टेशन बना खंडहर

चकिया नगर के वार्ड नंबर–3 शमशेर नगर में स्थित सरकारी रोडवेज बस स्टेशन पूरी तरह से बंद पड़ा है।
यह कोई आंशिक अव्यवस्था नहीं, कोई सीमित संचालन नहीं, बल्कि शून्य संचालन (ZERO OPERATION) की स्थिति है।
यहां से किसी भी मार्ग पर एक भी सरकारी रोडवेज बस नहीं चलती। टिकट खिड़की बंद है, प्लेटफॉर्म सूने हैं, परिसर में सन्नाटा पसरा है और बस स्टेशन केवल नाम का रह गया है।

जिस रोडवेज बस स्टेशन ने कभी चकिया को वाराणसी, प्रयागराज, लखनऊ, सोनभद्र जैसे बड़े शहरों से जोड़ा था, आज वही स्टेशन जनप्रतिनिधियों और प्रशासनिक उदासीनता की कब्रगाह बन चुका है।

1975 से 2026: आधी सदी में भी स्थायी समाधान नहीं

वर्ष 1975 में लंबे कानूनी संघर्ष के बाद स्थापित यह बस स्टेशन कभी पूरे क्षेत्र की जीवनरेखा हुआ करता था।
सरकारी बसों का नियमित संचालन, सस्ती यात्रा, सुरक्षित आवागमन—सब कुछ उपलब्ध था।

लेकिन आज 50 साल बाद सवाल उठता है—
क्या विकास की रफ्तार इतनी तेज़ है कि एक बस स्टेशन चलाना भी सरकार के बस की बात नहीं रह गई?

Dalimss Sunbeam Chakia

सच कड़वा है: चकिया में रोडवेज सेवा पूरी तरह ठप

आज की सच्चाई यह है कि—

  • चकिया रोडवेज बस स्टेशन से एक भी बस नहीं चलती
  • यात्रियों के लिए सरकारी परिवहन शून्य
  • छात्र, मजदूर, कर्मचारी, महिलाएं, बुजुर्ग—सब मजबूर
  • महंगे, असुरक्षित और अनाधिकृत प्राइवेट वाहनों का सहारा

यह स्थिति सिर्फ असुविधा नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक शोषण है।

Silver Bells Chakia

₹100 की यात्रा ₹300 में—गरीब पर सीधा वार

स्थानीय नागरिकों का कहना है—

“पहले सरकारी बस से बनारस या आसपास जाना ₹100 में हो जाता था।
आज वही सफर ₹250–₹300 में करना पड़ रहा है।
शाम 6 बजे के बाद लौटने का कोई सुरक्षित साधन नहीं मिलता।
ऑटो मिले तो जान का खतरा अलग।”

यह स्थिति सीधे-सीधे आम आदमी की जेब और जान दोनों पर हमला है।

सुंदरीकरण का नाटक, संचालन शून्य

कुछ महीने पहले शासन के निर्देश पर रोडवेज निगम ने 4 लाख रुपये खर्च कर—

  • रंग-रोगन
  • गेट की मरम्मत
  • टीन शेड का नवीनीकरण

कर दिया।
लेकिन जनता पूछ रही है—

जब बस ही नहीं चलनी थी,
तो यह सुंदरीकरण किसके लिए था?
वीरान इमारत सजाने के लिए?

₹195.74 लाख की स्वीकृति—काग़ज़ों में उम्मीद, ज़मीन पर सन्नाटा

क्षेत्रीय विधायक कैलाश आचार्य द्वारा यह दावा किया गया है कि—

“चकिया रोडवेज बस स्टेशन के पुनर्निर्माण के लिए ₹195.74 लाख की स्वीकृति मिल चुकी है।”

लेकिन जनता का सीधा सवाल है—

  • बसें कब चलेंगी?
  • डिपो कब बनेगा?
  • यात्री सुविधा कब मिलेगी?

क्योंकि केवल भवन बना देने से रोडवेज नहीं चलती,
नीतिगत इच्छाशक्ति और प्रशासनिक गंभीरता चाहिए।

‘डिपो नहीं है’—सबसे कमजोर बहाना

कुछ जिम्मेदार यह तर्क दे रहे हैं कि—

“चंदौली में डिपो नहीं है, इसलिए बसें नहीं चल रहीं।”

तो सवाल सीधा है—
जब पहले चकिया से वाराणसी और प्रयागराज तक बसें चलती थीं, तब कौन सा डिपो था?
यह तर्क नहीं, बल्कि नाकामी छिपाने का बहाना है।

आंदोलन, ज्ञापन, पोर्टल—सब बेअसर

  • स्वयंसेवी संस्थाएं
  • बार एसोसिएशन
  • छात्र संगठन
  • आम नागरिक

सबने जुलूस निकाले, ज्ञापन दिए, मुख्यमंत्री पोर्टल पर शिकायतें कीं।
लेकिन नतीजा?
बस स्टेशन आज भी बंद, जनता आज भी परेशान।

2027 चुनाव की दहलीज़ पर खड़ा एक विस्फोटक मुद्दा

एक पंचवर्षीय कार्यकाल समाप्त होने वाला है।
2027 में फिर चुनाव होंगे।

लेकिन अगर इतने सालों में भी—

  • एक बस स्टेशन चालू नहीं हो सका
  • एक भी रोडवेज बस नहीं चल सकी

तो जनता यह सवाल पूछने के लिए पूरी तरह तैयार है—

क्या पूरे पांच साल भी कम पड़ गए चकिया को बस सुविधा देने के लिए?

निष्कर्ष: यह लापरवाही नहीं,सीधे मानवाधिकार का हनन है। मुख्यमंत्री का फरमान सडके गड्डा मुक्त लेकिन बसे नदारत ।

चकिया रोडवेज बस स्टेशन का पूरी तरह बंद होना—

  • प्रशासनिक विफलता है
  • जनप्रतिनिधियों की प्राथमिकता पर सवाल है
  • और आम जनता के साथ खुला अन्याय है

जब तक—

  • नियमित रोडवेज बस संचालन शुरू नहीं होता
  • सस्ती और सुरक्षित यात्रा उपलब्ध नहीं होती

तब तक किसी भी विकास का दावा खोखला और झूठा है।

चकिया पूछ रहा है—
“इमारत चाहिए या सुविधा?
काग़ज़ी विकास चाहिए या ज़मीनी राहत?”

अब फैसला जनता के हाथ में है।

रोडवेज बस स्टेशन नहीं, अवैध ऑटो स्टैंड बन चुका है चकिया का सरकारी परिसर

चकिया का सरकारी रोडवेज बस स्टेशन आज बस स्टेशन नहीं, बल्कि अवैध ऑटो स्टैंड, गंदगी का अड्डा और प्रशासनिक उपेक्षा का जीता-जागता सबूत बन चुका है।
जहां कभी सरकारी बसें खड़ी होती थीं, आज वहां ऑटो और प्राइवेट वाहन मनमानी ढंग से सवारी भर रहे हैं।
चारों ओर मल-मूत्र, कूड़ा-कचरा, बदबू और वीरानी फैली हुई है।
शौचालय की कोई व्यवस्था नहीं, सफाई शून्य है और पूरा परिसर असामाजिक तत्वों के लिए सुरक्षित ठिकाना बन चुका है।

बस स्टेशन की इमारतें धीरे-धीरे गिर रही हैं, छतें जर्जर हैं, दीवारें टूट रही हैं और कोई देखने-सुनने वाला नहीं है।
दिन में सन्नाटा, शाम होते ही डर—यह हालत किसी तहसील मुख्यालय की नहीं, बल्कि सरकारी संवेदनहीनता की चरम सीमा है।

रंग-रोगन का नाटक क्यों, जब बसें चलनी ही नहीं?

सबसे बड़ा और सबसे कड़वा सवाल यही है कि—
जब चकिया रोडवेज बस स्टेशन से एक भी बस नहीं चलनी है,
तो फिर बार-बार रंग-रोगन, मरम्मत और सुंदरीकरण किसके लिए?

क्या वीरान इमारतों को रंग देना ही विकास है?
क्या बंद पड़े प्लेटफॉर्म पर पेंट कर देने से यात्रियों की परेशानी खत्म हो जाएगी?

यह सीधा-सीधा सरकारी धन की बर्बादी और जनता की आंखों में धूल झोंकने जैसा प्रतीत होता है।

₹195.74 लाख का पुनर्निर्माण: समाधान या नया छल?

अब यह दावा किया जा रहा है कि ₹195.74 लाख रुपये की लागत से चकिया स्थित रोडवेज बस स्टेशन का पुनर्निर्माण कराया जाएगा।
लेकिन जनता पूछ रही है—

  • क्या पुनर्निर्माण के बाद वास्तव में बसें चलेंगी?
  • क्या वर्षों से बंद पड़ी रोडवेज सेवा फिर शुरू होगी?
  • क्या चकिया वासी फिर से मुगलसराय, बनारस, अहरौरा, रामनगर, मिर्जापुर, सोनभद्र सरकारी बसों से जा सकेंगे?

या फिर—
नई इमारत बनेगी,
फोटो खिंचेंगे,
शिलापट्ट लगेगा
और उसके बाद फिर वही सन्नाटा?

अगर बसें नहीं चलेंगी, तो इमारत किस काम की?

यह सवाल अब टालने लायक नहीं रहा—
जब संचालन की कोई ठोस योजना नहीं,
डिपो का कोई समाधान नहीं,
बसों की उपलब्धता नहीं—
तो फिर करोड़ों का पुनर्निर्माण आखिर किस उद्देश्य से?

यह विकास नहीं, बल्कि काग़ज़ी आंकड़ों का खेल लगता है।

चकिया वासियों के साथ खुला अन्याय

चकिया की जनता आज मजबूर है—

  • महंगे प्राइवेट साधनों पर
  • असुरक्षित ऑटो और टेंपो पर
  • रात में जान जोखिम में डालकर यात्रा करने पर

यह स्थिति सिर्फ असुविधा नहीं, बल्कि सामाजिक अन्याय और प्रशासनिक असफलता है।

यह सवालिया निशान नहीं तो और क्या है?

एक तरफ विकास के दावे,
दूसरी तरफ पूरी तरह बंद रोडवेज बस स्टेशन।

एक तरफ करोड़ों की स्वीकृति,
दूसरी तरफ जनता की रोज़मर्रा की यात्रा की बर्बादी।

चकिया पूछ रहा है—

“हमें रंगी हुई दीवारें नहीं, चलती हुई बसें चाहिए।”

अब यह मुद्दा सिर्फ रोडवेज का नहीं,
जनप्रतिनिधियों की नीयत, प्रशासन की प्राथमिकता और 2027 के चुनाव का आईना बन चुका है।

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