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????️ “बादल बरस पड़े, किसान उतर पड़े… पर बांध अब भी सूने हैं!”

चकिया-चंदौली के बांध सूखे, घाट डूबे, खेत फंसे – श्रावण में जल की उलझी राजनीति

✍️ के०सी०श्रीवास्तव एड० एडिटर इन चीफ की कलम से

खबरी न्यूज नेशनल नेटवर्क चकिया‚ चंदौली।

श्रावण मास की दस्तक के साथ हर साल की तरह इस बार भी उम्मीदों की झड़ी लगती है। किसान आसमान की ओर देखकर राहत की सांस लेते हैं, भक्त गंगा के घाटों पर आरती के दीप जलाते हैं, और प्रशासन मानता है कि बारिश अपने काम में जुट गई है।

SRVS Sikanderpur

लेकिन 2025 का यह श्रावण थोड़ा अलग है – खेतों में कीचड़ है, घाटों में बाढ़ है, पर बांधों में सूखी चुप्पी पसरी है।
यह कहानी सिर्फ चकिया-चंदौली की नहीं, बल्कि एक ऐसे संतुलन की है जो मौसम, इकोनॉमी और मानवीय भावना के बीच लटक रहा है।

???? चकिया-चंदौली: बरसे मेघ, पर बांध अब भी प्यासे!

चकिया, लतीफशाह, नौगढ़, मूसाखांड और भैसौड़ा — ये वो नाम हैं जो बारिश के साथ उम्मीद के प्रतीक बन जाते हैं। पर इस बार हाल कुछ ऐसा है:यह है बुधवार की सायं 5 बजे की रिर्पोट

बांध/जलाशयवर्तमान जलस्तरकुल क्षमता
भैसौड़ा903.2 फीट2981.6
मूसाखांड345 फीट1900
लतीफशाह286.2 फीट318 फीट
नौगढ़ बांध888 फीट1663 फीट

???? स्पष्ट संकेत: इतनी बारिश के बावजूद बांधों पर कोई ठोस असर नहीं। न जल निकासी की योजना दिख रही, न संग्रहण की सोच।

किसान बेचैन हैं, क्योंकि खेतों में भरती जा रही कीचड़ ने काम तो बढ़ा दिया, लेकिन सिंचाई की गारंटी नहीं दी। पानी है भी तो कंट्रोल में नहीं, और जहाँ चाहिए वहाँ नदारद

Dalimss Sunbeam Chakia

???? किसानों की दशा: “मेघ बरसे तो क्याǃ

चकिया के गाँवों में किसान हल लिए सुबह-सुबह निकल रहे हैं, पर हर खेत की मेड़ पर एक ही चर्चा –
“बांध नहीं भरे तो बरसात किस काम की?” वही लतीफशाह से कर्मनाशा नहर चल रही है इस नहर से सिचाई करने वालों की लगभग चाँदी है उनके खेतो में पानी हो रहा है और वे अपने खेतो की रोपनी भी कर रहे है। वही राइट कर्मनाशा में गोविन्दीपुर शाख में पानी न आने के कारण उधर के किसान एकदम से परेशान है। वही कटवाँ माफी के किसान व बृक्ष बंधु डा० परशुराम सिंह ने बताया कि राइट कर्मनाशा तो चल रही है लेकिन हम लोग पानी –पानी को मोहताज है।

  • गीरीश पांडेय एक बुज़ुर्ग किसान कहते हैं – “पहले आसमान देख खेत में उतरते थे, अब बांध देखकर ही उम्मीद लगती है। इस बार बादल धोखा दे गए या सिस्टम?”
  • नहरें सूखी हैं ।
  • पंप चल नहीं रहे ।
  • डीजल की कीमतें आसमान पर ।

???? कृषि अर्थव्यवस्था की नाड़ी फिर कमजोर हो रही है।

Silver Bells Chakia

???? गंगा बनीं रौद्र: काशी के 84 घाटों पर जल-प्रलय का दृश्य

अब आइए बनारस की ओर – जहाँ श्रद्धा और संकट साथ-साथ बह रहे हैं।
गंगा का जलस्तर हर घंटे 4 सेमी की रफ्तार से बढ़ रहा है।

स्थितितथ्य
जलस्तर वृद्धिप्रति घंटे 4 सेमी
घाटों की संख्यासभी 84 घाट डूब चुके हैं
गंगा आरतीमोटरबोट पर प्रतिबंध
मंदिर/विग्रहशीतला माता मंदिर जलमग्न

“सुबह-ए-बनारस” का मंच भी डूब गया।
काशी की आत्मा को झकझोरने वाला दृश्य सामने है। घाटों की सीढ़ियाँ नहीं दिख रहीं, आरती अब घाटों की बजाय छतों और नावों से हो रही है।

???? मानव जीवन पर प्रभाव: श्रद्धा भी डरी, रोज़गार भी मरा

  • ???? फूलवाले घाट छोड़ कर वापस लौट गए
  • ???? नाविकों की रोज़ी पर ताला – “न घाट खुले, न कमाई हुई”
  • ???? पुजारियों की आमदनी बंद
  • ???? होटल-धर्मशालाएं खाली
  • ???? जल पुलिस 24×7 अलर्ट पर

बनारस का घाट अब पर्यटन स्थल नहीं, संकट स्थल बन गया है।

???? प्रशासन और विज्ञान: क्या ये सिर्फ बारिश है या संकेत?

विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं:
???? “यह सामान्य मॉनसून नहीं, जलवायु असंतुलन का संकेत है।”

  • उत्तराखंड-नेपाल से अधिक जलप्रवाह
  • तटबंधों की हालत चिंताजनक
  • नदियों की सफाई और गहराई पर ध्यान नहीं

???? जल संसाधनों का प्रबंधन ठोस नहीं तो इस साल भी लाखों लोग बेघर, खेती बर्बाद और अर्थव्यवस्था लाचार।

???? इकोनॉमी का विश्लेषण: घाटों से खेतों तक घाटा ही घाटा

क्षेत्रप्रभाव
कृषिसिंचाई संकट, लागत बढ़ी
पर्यटनबुकिंग रद्द, घाट खाली
रोज़गारनाविक, गाइड, पुजारी प्रभावित
बाज़ारआवाजाही कम, बिक्री ठप
CSR/फंडिंगजल परियोजनाओं पर खर्च नहीं

???? लोगों की आवाज़: “न बारिश सुकून देती है, न सूखा राहत”

  • गीता देवी, घाट के पास रहने वाली गृहणी – “हर साल पानी आता है, लेकिन हर बार हम नई जगह शिफ्ट होते हैं। प्रशासन हर बार नया वादा करता है, नतीजा एक सा होता है।”
  • प्रदीप मिश्रा, चकिया के युवा किसान – “हमें नहर चाहिए, योजना चाहिए। बारिश पर पूरा सिस्टम टिका है, ये जोखिम है।”

???? खबरी की अपील: ये सिर्फ मौसम नहीं, एक चेतावनी है!

अब सवाल उठते हैं:

  1. क्या बारिश का होना पर्याप्त है, जब तक जल संग्रह और वितरण की योजना ना हो?
  2. क्या गंगा जैसी नदी को हर साल बाढ़ लाने देना लापरवाही नहीं?
  3. क्या चकिया के किसान सिर्फ आसमान पर भरोसा कर जिएंगे?

खबरी न्यूज़ की 5 मांगें:

  1. जलाशयों की स्थिति रियल टाइम सार्वजनिक हो
  2. नहर और पंप परियोजनाओं का विस्तार किया जाए
  3. बांधों की क्षमता बढ़ाई जाए और पुनरुद्धार किया जाए
  4. गंगा किनारे बसे गाँवों को त्वरित राहत योजना में शामिल किया जाए
  5. जलवायु नीति में किसानों को प्राथमिकता दी जाए

???? अंतिम शब्द:


“बांध सूने हैं, घाट डूबे हैं, खेत कीचड़ में हैं – और किसान फिर अकेला है।”

खबरी न्यूज आपको आवाज़ देने के लिए है —
“हम सिर्फ रिपोर्ट नहीं करते, आपकी लड़ाई को आवाज़ भी देते हैं!”

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