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मजदूर दिवस पर मौत: अरुण उर्फ गोलू की दर्दनाक कहानी, सिस्टम की लापरवाही पर उठे सवाल

मजदूर दिवस पर मौत

1 मई… जिस दिन पूरी दुनिया मजदूरों के सम्मान और उनके अधिकारों की बात करती है, उसी दिन एक मजदूर की जिंदगी लापरवाही की भेंट चढ़ गई। ये सिर्फ एक हादसा नहीं, बल्कि सिस्टम की संवेदनहीनता और कंपनियों की बेरुखी का जीता-जागता उदाहरण है।
जनपद चंदौली के थाना चकिया क्षेत्र अंतर्गत पचवनिया गांव के रहने वाले अरुण चौहान उर्फ गोलू पुत्र बब्बू चौहान  उम्र 21 वर्ष , जो अपने परिवार का सहारा था, बेंगलुरु की एक प्राइवेट कंपनी “एवन गोल्ड स्टील” में मेंटेनेंस का काम करते था। मेहनती और जिम्मेदार अरुण जल्द ही अपने घर लौटने की तैयारी में था। बताया जा रहा है कि वह एक-दो दिन में गांव आने वाला था और इसी के चलते कपड़े धोने जैसे छोटे-छोटे कामों में लगे हुए था । लेकिन किसे पता था कि ये उनकी जिंदगी के आखिरी पल होंगे।
प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक, कंपनी द्वारा दिए गए रूम में बिजली के तारों की हालत बेहद खराब थी। वायरिंग का जोड़ खुला हुआ था, जिसकी शिकायत कर्मचारियों ने कई बार कंपनी मैनेजमेंट से की थी। लेकिन हर बार की तरह इस बार भी शिकायतों को नजरअंदाज कर दिया गया। यही लापरवाही अरुण की मौत की वजह बन गई।

1 मई मजदूर दिवस के दिन अचानक अरुण उस खुले तार की चपेट में आ गए। करंट इतना तेज था कि मौके पर ही उनकी मौत हो गई। एक पल में सब कुछ खत्म हो गया — सपने, उम्मीदें और एक परिवार का सहारा।

SRVS Sikanderpur

घटना के बाद कंपनी प्रबंधन की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। क्या समय रहते वायरिंग ठीक कर दी जाती, तो आज अरुण जिंदा होते? क्या मजदूरों की सुरक्षा सिर्फ कागजों तक सीमित रह गई है?

पोस्टमार्टम के बाद एम्बुलेंस से अरुण का पार्थिव शरीर 48 घंटे बाद, 3 मई की सुबह करीब 9:30 बजे उनके पैतृक गांव पचवनिया पहुंचा। जैसे ही एम्बुलेंस गांव में दाखिल हुई, माहौल गमगीन हो गया। अपने बेटे का शव देखते ही परिजन बेसुध हो गए। मां की चीखें और पिता की खामोशी हर किसी का दिल चीर रही थी।

गांव में मातम पसरा हुआ है। हर आंख नम है, हर जुबान पर एक ही सवाल — आखिर कब तक मजदूर यूं ही मरते रहेंगे?
यह घटना न सिर्फ एक परिवार की त्रासदी है, बल्कि पूरे समाज के लिए एक चेतावनी भी है। मजदूर दिवस पर हुई यह मौत यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या हम सच में अपने श्रमिकों की सुरक्षा और सम्मान को लेकर गंभीर हैं?

आज जरूरत है सख्त कानूनों के पालन की, कंपनियों की जवाबदेही तय करने की और मजदूरों के लिए सुरक्षित कार्य वातावरण सुनिश्चित करने की। वरना ऐसे “अरुण” हर साल सिस्टम की लापरवाही के शिकार होते रहेंगे।

Dalimss Sunbeam Chakia

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