Khabari News चकिया (चंदौली)। चकिया नगर के बुद्ध नगर कॉलोनी स्थित पृथ्वीराज चौहान हॉस्पिटल में प्रसूता की मौत के बाद स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली, निजी अस्पतालों की निगरानी व्यवस्था और अवैध रूप से संचालित चिकित्सा संस्थानों पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। मामले ने तब और तूल पकड़ लिया जब जांच में अस्पताल का पंजीकरण समाप्त पाया गया और इसके बावजूद वहां इलाज एवं ऑपरेशन जैसी सेवाएं संचालित किए जाने का खुलासा हुआ। घटना के बाद स्वास्थ्य विभाग ने कार्रवाई करते हुए अस्पताल को सील कर दिया है, जबकि मृतका के परिजन दोषियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की मांग कर रहे हैं।
प्रसूता की मौत और अस्पताल सील होने की कार्रवाई के बाद अस्पताल संचालक व बहुजन समाज पार्टी के विधान सभा प्रभारी चकिया सुरेश चौहान फरार हो गया है। सूत्रों के अनुसार स्वास्थ्य विभाग की जांच और पुलिस कार्रवाई की भनक लगते ही वह अस्पताल छोड़कर कहीं चला गया। पुलिस उसकी तलाश कर रही है तथा मामले में उसकी भूमिका की भी जांच की जा रही है।
मामला चकिया नगर के वार्ड संख्या सात स्थित बुद्ध नगर कॉलोनी में संचालित पृथ्वीराज चौहान हॉस्पिटल का है। यहां इलाज के दौरान बिहार निवासी एक प्रसूता की मौत हो गई, जिसके बाद अस्पताल प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग दोनों सवालों के घेरे में आ गए हैं।

जानकारी के अनुसार बिहार के कैमूर जिले के चांद थाना क्षेत्र के लाहोपाकड़ गांव निवासी दीपक पासवान अपनी पत्नी 22 वर्षीय विनीता पासवान को प्रसव पीड़ा होने पर छह जून को चकिया स्थित संयुक्त चिकित्सालय लेकर पहुंचे थे। परिजनों के मुताबिक महिला की स्थिति गंभीर होने के कारण चिकित्सकों ने उसे बेहतर उपचार के लिए जिला अस्पताल रेफर कर दिया था।
मृतका के पति दीपक पासवान ने आरोप लगाया कि इसी दौरान कुछ लोगों ने उन्हें निजी अस्पताल में बेहतर इलाज का भरोसा दिया। परिजनों का कहना है कि एक कथित दलाल के माध्यम से उन्हें चकिया नगर स्थित पृथ्वीराज चौहान हॉस्पिटल पहुंचाया गया, जहां प्रसूता को भर्ती कर लिया गया।
परिजनों के अनुसार अस्पताल में प्रसूता का ऑपरेशन किया गया और उसने एक बच्ची को जन्म दिया। शुरुआत में सब कुछ सामान्य बताया गया, लेकिन अगले दिन अचानक महिला की हालत बिगड़ने लगी। परिवार का आरोप है कि उस समय अस्पताल में कोई योग्य चिकित्सक मौजूद नहीं था और स्वास्थ्यकर्मियों द्वारा स्थिति संभालने का प्रयास किया गया।
परिजनों ने आरोप लगाया कि अस्पताल में मौजूद अप्रशिक्षित कर्मियों ने कई इंजेक्शन लगाए, जिसके बाद महिला की हालत और अधिक गंभीर हो गई। कुछ ही देर बाद उसकी मौत हो गई। इस घटना ने परिजनों को झकझोर कर रख दिया।

मृतका के परिवार का आरोप है कि जब अस्पताल प्रशासन को स्थिति की गंभीरता का एहसास हुआ तो उन्होंने प्रसूता को अपने वाहन से वाराणसी के एक निजी अस्पताल भेज दिया। आरोप है कि वहां पहुंचने के बाद अस्पताल से जुड़े लोग परिजनों को छोड़कर फरार हो गए। बाद में परिजन किसी तरह महिला के शव को लेकर वापस चकिया पहुंचे।
घटना की जानकारी फैलते ही क्षेत्र में आक्रोश का माहौल बन गया। मृतका के परिजनों और स्थानीय लोगों ने अस्पताल प्रशासन पर लापरवाही का आरोप लगाते हुए कार्रवाई की मांग की। मामले की गंभीरता को देखते हुए स्वास्थ्य विभाग ने तत्काल जांच के आदेश दिए।

नोडल अधिकारी डॉ. संजय सिंह और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र प्रभारी डॉ. विकास सिन्हा के नेतृत्व में गठित टीम ने अस्पताल पहुंचकर दस्तावेजों और अभिलेखों की जांच की। जांच के दौरान जो तथ्य सामने आए, उन्होंने स्वास्थ्य विभाग की निगरानी व्यवस्था पर भी सवाल खड़े कर दिए।
जांच टीम को पता चला कि अस्पताल का पंजीकरण काफी पहले समाप्त हो चुका था। विभागीय अभिलेखों के अनुसार अस्पताल का पूर्व पंजीकरण पिछले वर्ष अप्रैल माह में ही निरस्त हो गया था। इसके बावजूद अस्पताल संचालक द्वारा न तो नया पंजीकरण कराया गया और न ही वैधानिक अनुमति प्राप्त की गई।
सबसे गंभीर बात यह सामने आई कि पंजीकरण समाप्त होने के बावजूद अस्पताल में मरीजों का इलाज किया जा रहा था और ऑपरेशन जैसी संवेदनशील चिकित्सीय सेवाएं भी संचालित की जा रही थीं। जांच टीम को अस्पताल प्रबंधन की ओर से कोई वैध पंजीकरण दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किया जा सका।
स्वास्थ्य विभाग ने प्रथम दृष्टया नियमों के उल्लंघन को गंभीर मानते हुए अस्पताल को तत्काल प्रभाव से सील कर दिया। अधिकारियों ने अस्पताल परिसर को बंद कर आगे की जांच शुरू कर दी है।
प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र प्रभारी डॉ. विकास सिन्हा ने बताया कि अस्पताल संचालक वैध दस्तावेज उपलब्ध नहीं करा सका। ऐसे में नियमानुसार कार्रवाई करते हुए अस्पताल को सील किया गया है। मामले की विस्तृत रिपोर्ट तैयार कर उच्चाधिकारियों को भेजी जा रही है।
वहीं चकिया कोतवाल अर्जुन सिंह ने बताया कि मृतका के परिजनों की ओर से तहरीर प्राप्त हुई है। पुलिस सभी आरोपों की जांच कर रही है। पोस्टमार्टम रिपोर्ट और जांच रिपोर्ट के आधार पर आगे की कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
इस पूरे प्रकरण ने एक बार फिर स्वास्थ्य विभाग की निगरानी व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है। स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि अस्पताल का पंजीकरण पहले ही समाप्त हो चुका था तो वह इतने लंबे समय से कैसे संचालित हो रहा था। लोगों का यह भी आरोप है कि यह पहला मौका नहीं है जब उक्त अस्पताल विवादों में आया हो। क्षेत्रीय स्तर पर चर्चा है कि इससे पहले भी अस्पताल पर कार्रवाई हो चुकी है, लेकिन इसके बावजूद संचालन जारी रहा।
स्थानीय नागरिकों का मानना है कि जिले में कई निजी अस्पताल और नर्सिंग होम ऐसे हैं जिनकी नियमित जांच नहीं होती। परिणामस्वरूप कई संस्थान नियमों को दरकिनार कर मरीजों की जान के साथ खिलवाड़ करते रहते हैं। प्रसूता की मौत के बाद अब लोग पूरे मामले की निष्पक्ष जांच और दोषियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की मांग कर रहे हैं।
फिलहाल एक नवजात बच्ची अपनी मां को खो चुकी है और एक परिवार गहरे सदमे में है। वहीं यह घटना स्वास्थ्य व्यवस्था के उन कमजोर पहलुओं को भी उजागर कर रही है, जिन पर समय रहते ध्यान न दिया गया तो भविष्य में ऐसे और गंभीर हादसे सामने आ सकते हैं।


















