नन्द को आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की!
खबरी न्यूज | स्पेशल इन्वेस्टिगेशन रिपोर्ट
मथुरा की कारागार से गोकुल की गलियों तक…
जिस घड़ी का इंतजार करोड़ों कृष्णभक्त पूरे वर्ष करते हैं, वह घड़ी अब आ चुकी है। मंदिरों में तैयारियां पूरी हैं, घर-घर झूले सज चुके हैं और भक्तों की जुबान पर एक ही जयकारा है—“नन्द के घर आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की!”

4 सितंबर 2026 को जन्माष्टमी, लेकिन 5 सितंबर की आधी रात तक चलेगा जन्मोत्सव
पंचांग के अनुसार वर्ष 2026 में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी शुक्रवार, 4 सितंबर को मनाई जा रही है। इस दिन भाद्रपद मास, कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि है। दिल्ली आधारित पंचांग गणना के अनुसार अष्टमी तिथि 4 सितंबर की रात 2:25 बजे शुरू होकर 5 सितंबर की रात लगभग 12:13 बजे समाप्त होगी।
यही कारण है कि जन्माष्टमी का सबसे महत्वपूर्ण अनुष्ठान 4 सितंबर की रात से 5 सितंबर की मध्यरात्रि के आसपास संपन्न होगा।
कब होगा श्रीकृष्ण का जन्म?
धार्मिक परंपरा में भगवान श्रीकृष्ण के प्राकट्य का समय मध्यरात्रि यानी निशीथ काल माना गया है। 2026 में दिल्ली पंचांग के अनुसार निशीथ पूजा मुहूर्त रात 11:57 बजे से 12:43 बजे तक रहेगा। यही वह लगभग 46 मिनट की अवधि है, जिसमें भक्त बाल गोपाल का अभिषेक, पूजन और जन्मोत्सव करेंगे।
अर्थात कान्हा के जन्म का धार्मिक प्रतीकात्मक क्षण आधी रात के आसपास माना जाएगा, न कि दिन के किसी सामान्य समय में।

रोहिणी नक्षत्र ने बढ़ाई जन्माष्टमी की महिमा
श्रीकृष्ण जन्म की परंपरा में रोहिणी नक्षत्र का विशेष महत्व है। 2026 में रोहिणी नक्षत्र 4 सितंबर की लगभग 12:29 बजे रात से 11:04 बजे रात तक रहने की गणना दी गई है।
यानी इस बार अष्टमी और रोहिणी नक्षत्र का विशेष संयोग जन्माष्टमी को और खास बना रहा है। कई ज्योतिषीय स्रोत इसे लंबे अंतराल के बाद बनने वाला महत्वपूर्ण संयोग बता रहे हैं।

अब सबसे बड़ा सवाल—जन्माष्टमी पर भद्रा कब है?
यहीं सबसे ज्यादा भ्रम फैल रहा है। 4 सितंबर की जन्माष्टमी के दिन भद्रा काल नहीं पड़ रहा है। उपलब्ध पंचांग में सितंबर 2026 की भद्रा की अगली अवधि 6 सितंबर को बताई गई है, जबकि पिछली भद्रा 3 सितंबर को थी।
इसलिए जन्माष्टमी की आधी रात होने वाली श्रीकृष्ण पूजा को भद्रा के कारण रोकने की जरूरत नहीं है।
व्रत कब खुलेगा?
व्रत पारण की परंपरा अलग-अलग संप्रदाय और स्थानीय पंचांग के अनुसार बदल सकती है। कई परंपराओं में जन्मोत्सव और निशीथ पूजा के बाद पारण किया जाता है, जबकि वैष्णव परंपरा में अगले दिन निर्धारित नियमों के अनुसार पारण किया जाता है। इसलिए श्रद्धालुओं को अपने स्थानीय पंचांग और परंपरा का पालन करना चाहिए।
क्यों खास है 2026 की जन्माष्टमी?
इस बार जन्माष्टमी सिर्फ एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि अष्टमी, रोहिणी और मध्यरात्रि के जन्मोत्सव का विशेष संगम लेकर आई है। मथुरा-वृंदावन से लेकर काशी, अयोध्या और देश के तमाम कृष्ण मंदिरों में रात होते ही भजन, कीर्तन, शंखनाद और जयकारों से वातावरण गूंजेगा।
और जैसे ही घड़ी मध्यरात्रि के करीब पहुंचेगी—
शंख बजेगा… घंटियां गूंजेंगी… मंदिरों के पट खुलेंगे… और गूंज उठेगा—
“हाथी घोड़ा पालकी, जय कन्हैया लाल की!”
नन्द के घर आनंद भयो… जय श्रीकृष्ण!
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डिस्क्लेमर
खबरी न्यूज द्वारा प्रकाशित यह विशेष रिपोर्ट उपलब्ध पंचांग, धार्मिक परंपराओं और विभिन्न पंचांग-गणनाओं में दिए गए समय के आधार पर तैयार की गई है। तिथि, नक्षत्र, निशीथ काल, व्रत-पारण एवं अन्य धार्मिक मुहूर्तों के समय में स्थान, देशांतर-समय, पंचांग पद्धति तथा स्थानीय परंपरा के अनुसार कुछ अंतर संभव है। इसलिए श्रद्धालु पूजा-व्रत एवं पारण के लिए अपने क्षेत्र के स्थानीय पंचांग, मंदिर प्रशासन अथवा प्रमाणित आचार्य/ज्योतिषाचार्य से समय की अंतिम पुष्टि अवश्य करें।
इस रिपोर्ट में दिए गए धार्मिक एवं ज्योतिषीय संदर्भ आस्था और परंपरागत मान्यताओं पर आधारित हैं। “विशेष संयोग”, “15 साल बाद” अथवा अन्य ज्योतिषीय व्याख्याओं को वैज्ञानिक तथ्य या प्रमाणित भविष्यवाणी के रूप में नहीं लिया जाना चाहिए।
खबरी न्यूज का उद्देश्य किसी धार्मिक भावना को ठेस पहुंचाना नहीं, बल्कि उपलब्ध जानकारी को पाठकों तक तथ्यात्मक और जिम्मेदार तरीके से पहुंचाना है।




















