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सिंचाई विभाग की कार्यशैली पर उठे गंभीर सवाल, 3 से 5 दिन में खेतों तक पानी पहुंचाने का प्रशासन का वादा
खबरी न्यूज नेशनल नेटवर्क चकिया (चंदौली)। पचवनिया पुल पर निर्माणाधीन छलका (वीयर) की ऊंचाई को लेकर पिछले चार दिनों से जारी किसानों का शांतिपूर्ण लेकिन निर्णायक आंदोलन बुधवार को प्रशासन के आश्वासन के बाद समाप्त हो गया। आंदोलन की समाप्ति के साथ किसानों ने स्पष्ट कर दिया कि यह संघर्ष खत्म नहीं हुआ है, बल्कि फिलहाल प्रशासन को दिए गए समय का सम्मान किया गया है। यदि तीन से पांच दिनों के भीतर खेतों तक सिंचाई का पानी नहीं पहुंचा तो आंदोलन पहले से अधिक व्यापक रूप ले सकता है।
“हम पानी मांग रहे हैं, एहसान नहीं”—किसानों ने डीएम के सामने रखा मजबूत पक्ष
किसान दिवस के दौरान चंदौली पहुंचे किसानों के प्रतिनिधिमंडल ने जिलाधिकारी के समक्ष पूरी मजबूती से अपना पक्ष रखा। किसानों ने बताया कि निर्माणाधीन पुल पर बनाई जा रही छलका की ऊंचाई वर्षों से चली आ रही सिंचाई व्यवस्था को प्रभावित करेगी। यदि वर्तमान डिजाइन में बदलाव नहीं किया गया तो नहर का जल प्रवाह बाधित होगा और हजारों बीघा कृषि भूमि सिंचाई से वंचित हो जाएगी।

किसानों ने प्रशासन को यह भी बताया कि यह केवल एक निर्माण कार्य का मामला नहीं, बल्कि हजारों परिवारों की आजीविका और पूरे क्षेत्र की कृषि व्यवस्था का प्रश्न है।
सिंचाई विभाग की मनमानी पर किसानों का आक्रोश
धरना स्थल पर मौजूद किसानों का कहना था कि सिंचाई विभाग ने निर्माण कार्य शुरू करने से पहले न तो किसानों से राय ली और न ही स्थानीय परिस्थितियों का गंभीर अध्ययन किया। किसानों का आरोप है कि विभाग ने केवल कागजी मानकों के आधार पर निर्माण शुरू कर दिया, जबकि वर्षों से जिस स्तर पर पानी खेतों तक पहुंचता रहा है, उसे नजरअंदाज कर दिया गया।
ग्रामीणों का कहना है कि यदि समय रहते आवाज न उठाई जाती तो निर्माण पूरा होने के बाद पूरे क्षेत्र को स्थायी नुकसान झेलना पड़ता। किसानों ने सवाल उठाया कि आखिर बिना जमीनी हकीकत समझे ऐसी योजना कैसे तैयार कर दी गई।
प्रशासन हरकत में आया, तहसीलदार ने दिया भरोसा
धरने के चौथे दिन शाम को तहसीलदार देवेंद्र कुमार स्वयं धरना स्थल पहुंचे। उन्होंने किसानों से वार्ता करते हुए कहा कि प्रशासन इस मुद्दे को पूरी गंभीरता से ले रहा है और हर हाल में खेतों तक पानी पहुंचाने की व्यवस्था की जाएगी।

उन्होंने किसानों से आंदोलन समाप्त करने का अनुरोध करते हुए भरोसा दिलाया कि अगले तीन से पांच दिनों के भीतर समाधान की दिशा में प्रभावी कार्रवाई होगी।
तहसीलदार ने किसानों से यह भी कहा कि यदि तय समय सीमा के बाद भी पानी खेतों तक नहीं पहुंचता है तो वे पुनः उन्हें सूचित करें। ऐसी स्थिति में किसानों को दोबारा आंदोलन करने का पूरा अधिकार होगा और प्रशासन उनकी बात सुनने के लिए बाध्य रहेगा।

चार दिन तक अनुशासन और एकजुटता की मिसाल बना किसान आंदोलन
पचवनिया पुल पर चला यह आंदोलन पूरे समय शांतिपूर्ण रहा। क्षेत्र के विभिन्न गांवों के किसान बिना किसी राजनीतिक मंच के एकजुट होकर अपनी सिंचाई व्यवस्था बचाने के लिए डटे रहे। किसानों का कहना था कि उनका उद्देश्य किसी निर्माण कार्य का विरोध करना नहीं, बल्कि ऐसी तकनीकी त्रुटि को समय रहते सुधारना है जिससे भविष्य में खेती प्रभावित न हो।
इस आंदोलन ने यह भी साबित किया कि जब किसान संगठित होकर तथ्यों और तकनीकी पक्ष के साथ अपनी बात रखते हैं तो प्रशासन को भी गंभीरता से सुनना पड़ता है।
अब वादे की परीक्षा, प्रशासन और सिंचाई विभाग पर टिकी निगाहें
धरना समाप्त होने के बाद अब सबसे बड़ी जिम्मेदारी प्रशासन और सिंचाई विभाग पर आ गई है। किसानों को तीन से पांच दिनों के भीतर सिंचाई बहाल करने का भरोसा दिया गया है। यदि यह वादा समय पर पूरा होता है तो हजारों बीघा भूमि और सैकड़ों किसान परिवारों को राहत मिलेगी।
लेकिन यदि आश्वासन केवल कागजों तक सीमित रहा और खेतों तक पानी नहीं पहुंचा तो किसानों ने साफ संकेत दिए हैं कि वे पहले से अधिक व्यापक आंदोलन करने के लिए तैयार रहेंगे।
खबरी न्यूज की नजर
यह मुद्दा केवल एक पुल या एक छलका की ऊंचाई का नहीं, बल्कि किसानों के जीवन, उनकी फसल और क्षेत्र की कृषि व्यवस्था से जुड़ा है। विकास कार्य आवश्यक हैं, लेकिन यदि उनमें स्थानीय भूगोल, सिंचाई तंत्र और किसानों की वास्तविक जरूरतों की अनदेखी होगी तो ऐसे विवाद स्वाभाविक हैं। अब यह प्रशासन और सिंचाई विभाग की जिम्मेदारी है कि वे अपने आश्वासन को धरातल पर उतारकर किसानों का विश्वास कायम करें।
























