डिजिटल फंडिंग का नेटवर्क खंगाल रही एजेंसियां
प्रति पोस्ट 40 से 80 हजार रुपये भुगतान का दावा, स्पेशल सेल को सौंपी गई जांच, डिजिटल रिकॉर्ड और वित्तीय लेनदेन की गहन पड़ताल
खबरी न्यूज नेशनल नेटवर्क नई दिल्ली। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शन और उसके बाद भड़की हिंसा की जांच अब एक नए और बेहद संवेदनशील मोड़ पर पहुंच गई है। जांच एजेंसियां केवल हिंसा में प्रत्यक्ष रूप से शामिल लोगों तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि अब सोशल मीडिया के जरिए कथित रूप से माहौल बनाने वाले बड़े इंफ्लुएंसर्स, यूट्यूबर्स और डिजिटल मार्केटिंग नेटवर्क पर भी शिकंजा कसने की तैयारी कर रही हैं। सूत्रों के अनुसार, कई हाई-प्रोफाइल सोशल मीडिया क्रिएटर्स, पूर्व पत्रकारों और डिजिटल प्रचार से जुड़ी तीन बड़ी कंपनियों की गतिविधियां एजेंसियों के रडार पर हैं।
जांच एजेंसियों के मुताबिक, प्रदर्शन के समर्थन में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म इंस्टाग्राम, एक्स (पूर्व में ट्विटर) और यूट्यूब पर बड़े स्तर पर अभियान चलाया गया। दावा किया जा रहा है कि कई लोकप्रिय इंफ्लुएंसर्स को कथित तौर पर एक-एक पोस्ट के लिए 40 हजार से 80 हजार रुपये तक का भुगतान किया गया। इन भुगतानों का संबंध डिजिटल मार्केटिंग और सोशल मीडिया मैनेजमेंट से जुड़ी तीन बड़ी कंपनियों से होने की आशंका जताई जा रही है, जिनके दस्तावेज और वित्तीय रिकॉर्ड की जांच की जा रही है।

डिजिटल कैंपेन की परतें खोलेगी जांच
सूत्रों का कहना है कि एजेंसियां केवल सोशल मीडिया पोस्ट की सामग्री ही नहीं, बल्कि उनके पीछे की पूरी रणनीति, भुगतान की प्रक्रिया, प्रचार अभियान की टाइमलाइन और संबंधित पक्षों के बीच संभावित समन्वय की भी बारीकी से जांच कर रही हैं। डिजिटल रिकॉर्ड, बैंकिंग ट्रेल, ऑनलाइन ट्रांजैक्शन, कॉन्ट्रैक्ट, ईमेल और अन्य इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों का मिलान किया जा रहा है ताकि यह स्पष्ट हो सके कि अभियान स्वतः संचालित था या किसी संगठित नेटवर्क के तहत चलाया गया।
जांच का फोकस इस बात पर भी है कि क्या सोशल मीडिया के जरिए प्रदर्शन को व्यापक समर्थन दिलाने या भीड़ जुटाने के उद्देश्य से योजनाबद्ध प्रचार अभियान संचालित किया गया था। यदि ऐसा पाया जाता है, तो संबंधित व्यक्तियों और संस्थाओं के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जा सकती है।
पूर्व पत्रकार भी जांच के दायरे में
सूत्रों के अनुसार, कुछ पूर्व पत्रकारों पर भी प्रदर्शन के पक्ष में सोशल मीडिया अभियान चलाने और कथित रूप से डिजिटल नैरेटिव तैयार करने के आरोपों की जांच की जा रही है। एजेंसियां यह पता लगाने का प्रयास कर रही हैं कि इनकी भूमिका केवल व्यक्तिगत अभिव्यक्ति तक सीमित थी या किसी संगठित प्रचार तंत्र का हिस्सा थी। हालांकि, जांच पूरी होने से पहले किसी भी व्यक्ति की भूमिका पर अंतिम निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।
दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल कर रही जांच
दिल्ली पुलिस आयुक्त अनुराग कुमार के निर्देश पर पूरे मामले की जांच स्पेशल सेल को सौंप दी गई है। जांच एजेंसियों का मानना है कि सोशल मीडिया गतिविधियों और हिंसा के घटनाक्रम के बीच यदि कोई प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष संबंध सामने आता है तो उसके आधार पर आगे की कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

बताया जा रहा है कि 20 जुलाई को हुई हिंसा से जुड़े 20 मामलों के आधार पर 21 जुलाई को संसद मार्ग थाने में एफआईआर दर्ज की गई थी। यह एफआईआर थानाध्यक्ष इंद्रजीत की शिकायत पर दर्ज की गई, जिसमें भारतीय न्याय संहिता (BNS), आर्म्स एक्ट तथा सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने से संबंधित कानूनों की 15 गंभीर धाराएं लगाई गई हैं।
गंभीर धाराओं में दर्ज हुआ मामला
एफआईआर में दंगा, आपराधिक साजिश, हत्या के प्रयास, पुलिसकर्मियों पर हमला, सरकारी कार्य में बाधा, हथियार छीनने का प्रयास, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने और अन्य गंभीर अपराधों से संबंधित धाराएं शामिल हैं। जांच एजेंसियों का कहना है कि उपलब्ध वीडियो फुटेज, सीसीटीवी रिकॉर्डिंग, मोबाइल डेटा, सोशल मीडिया पोस्ट और डिजिटल साक्ष्यों का वैज्ञानिक तरीके से विश्लेषण किया जा रहा है।

डिजिटल फंडिंग नेटवर्क पर विशेष नजर
सूत्रों के अनुसार, जांच का सबसे महत्वपूर्ण पहलू कथित डिजिटल फंडिंग नेटवर्क है। एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि सोशल मीडिया प्रचार के लिए धन कहां से आया, किस माध्यम से भुगतान हुआ और किन लोगों अथवा संस्थाओं तक यह राशि पहुंची। यदि वित्तीय अनियमितता या अवैध फंडिंग के साक्ष्य मिलते हैं, तो जांच का दायरा और भी व्यापक हो सकता है।
सोशल मीडिया की भूमिका पर उठे सवाल
इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर बड़े सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर्स और डिजिटल प्रचार अभियानों की पारदर्शिता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि किसी आंदोलन या प्रदर्शन के समर्थन में भुगतान लेकर प्रचार किया जाता है, तो उसकी प्रकृति, उद्देश्य और कानूनी स्थिति की निष्पक्ष जांच आवश्यक है। साथ ही यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि जांच केवल उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर हो और किसी व्यक्ति या संस्था की जिम्मेदारी न्यायिक प्रक्रिया से पहले तय न मानी जाए।
खबरी न्यूज विश्लेषण
जंतर-मंतर हिंसा की जांच अब केवल सड़क पर हुई घटनाओं तक सीमित नहीं रही है, बल्कि डिजिटल दुनिया तक पहुंच चुकी है। यदि जांच एजेंसियों के दावे साक्ष्यों से पुष्ट होते हैं, तो यह मामला देश में सोशल मीडिया आधारित राजनीतिक और सामाजिक अभियानों की कार्यप्रणाली पर बड़ा प्रभाव डाल सकता है। आने वाले दिनों में स्पेशल सेल की जांच, डिजिटल फॉरेंसिक रिपोर्ट और वित्तीय दस्तावेज इस पूरे प्रकरण की दिशा तय करेंगे। फिलहाल जांच जारी है और आधिकारिक निष्कर्ष आने तक सभी दावों को जांच के दायरे में माना जाना चाहिए।




















