खबरी नेशनल न्यूज नेटवर्क | EXCLUSIVE INVESTIGATION
7 साल की फाइलें, दर्जनों शिकायतें और आखिरकार कब्जा!तिलौरी ‚चकिया की आराजी संख्या-86 का पूरा सच
7 वर्षों तक चला भूमि विवाद आखिरकार प्रशासनिक कार्रवाई तक पहुंचा, 30 जून को SDM के निर्देश पर तहसीलदार और पुलिस ने संयुक्त रूप से कराया मौजा तिलौरी तहसील चकिया में कब्जा परिवर्तन; अब ट्रिब्यूनल के आदेश को लेकर छिड़ी नई कानूनी बहस
EXCLUSIVE विशेष खोजी रिपोर्ट खबरी न्यूज नेशनल नेटवर्क
चकिया‚ चंदौली। कभी-कभी एक जमीन का टुकड़ा सिर्फ जमीन नहीं होता, बल्कि वह वर्षों तक चलने वाली कानूनी लड़ाई, सरकारी फाइलों का बोझ और न्याय की उम्मीद का प्रतीक बन जाता है। चकिया तहसील क्षेत्र के मौजा तिलौरी की आराजी संख्या-86 का मामला कुछ ऐसा ही निकला। वर्ष 2019 से शुरू हुआ विवाद आखिरकार 30 जून 2026 को उस मोड़ पर पहुंचा, जब तहसीलदार देवेंद्र के नेतृत्व में राजस्व विभाग की टीम ने पुलिस बल की मौजूदगी में संबंधित पक्ष को कब्जा दिलाया।
चकिया तहसील क्षेत्र के बहुचर्चित भूमि विवाद में 30 जून 2026 को प्रशासन ने उपजिलाधिकारी (SDM) के आदेश के अनुपालन में तहसीलदार एवं पुलिस प्रशासन की मौजूदगी में कब्जा परिवर्तन की कार्रवाई कराई। उपलब्ध अभिलेखों के अनुसार SDM ने तहसीलदार और क्षेत्राधिकारी (CO) को आदेश का अनुपालन सुनिश्चित कराने के निर्देश दिए थे, जिसके बाद राजस्व विभाग और पुलिस की संयुक्त टीम मौके पर पहुंची और कब्जा दिलाने की कार्रवाई पूरी की।

हालांकि, इस कार्रवाई के बाद विवाद का नया अध्याय शुरू हो गया। दूसरे पक्ष के डॉ. अरविंद पांडेय का दावा है कि संबंधित भूमि पर राजस्व परिषद/ट्रिब्यूनल का स्थगन आदेश पहले से प्रभावी था। उनका आरोप है कि उस आदेश की अनदेखी कर कार्रवाई की गई। दूसरी ओर प्रशासन का पक्ष है कि उसने सक्षम प्राधिकारी के आदेश का विधिसम्मत अनुपालन कराया।
खबरी नेशनल न्यूज नेटवर्क ने उपलब्ध दस्तावेजों, शिकायत-पत्रों और राजस्व प्रक्रिया का अध्ययन किया। इस खोजी रिपोर्ट में पूरे मामले को STEP-BY-STEP समझाया जा रहा है ताकि पाठक यह समझ सके कि आखिर विवाद क्या था और सात वर्षों तक मामला क्यों चलता रहा।
आखिर विवाद था क्या?
दस्तावेजों के अनुसार विवाद आराजी संख्या-86 मौजा तिलौरी तहसील चकिया की जमीन को लेकर था। शिकायतकर्ता का दावा था कि उक्त भूमि पर उसका वैध अधिकार है, जबकि दूसरे पक्ष के साथ स्वामित्व और कब्जे को लेकर विवाद उत्पन्न हो गया। मामला राजस्व न्यायालय तक पहुंचा और यहीं से लंबी कानूनी प्रक्रिया शुरू हुई।
शिकायतकर्ता का आरोप था कि विवाद लंबित रहने के बावजूद विपक्षी पक्ष जमीन पर निर्माण की तैयारी कर रहा था। इसी आशंका को लेकर कई बार प्रशासन से हस्तक्षेप की मांग की गई।

दूसरे पक्ष ने DRAT के Status Quo आदेश का हवाला देकर उठाए सवाल
किसी भी भूमि विवाद में अंतिम फैसला केवल कागजों पर दर्ज आदेश नहीं होता, बल्कि उस आदेश का जमीन पर अनुपालन ही सबसे बड़ी परीक्षा माना जाता है। चंदौली जनपद की चकिया तहसील में ऐसा ही एक बहुचर्चित भूमि विवाद करीब सात वर्षों तक राजस्व अभिलेखों, शिकायतों, न्यायिक प्रक्रियाओं और प्रशासनिक फाइलों के बीच उलझा रहा। आखिरकार 30 जून 2026 को प्रशासन ने उपजिलाधिकारी (SDM) के आदेश का अनुपालन कराते हुए तहसीलदार, क्षेत्राधिकारी (CO) और पुलिस बल की मौजूदगी में विवादित भूमि पर कब्जा परिवर्तन की कार्रवाई पूरी कराई। प्रशासन इसे न्यायिक एवं राजस्व प्रक्रिया के अनुरूप आदेश का अनुपालन बता रहा है, जबकि दूसरे पक्ष ने Debts Recovery Appellate Tribunal (DRAT) के पूर्व Status Quo (यथास्थिति) आदेश का हवाला देते हुए इस कार्रवाई पर सवाल उठाए हैं।
यह मामला अब केवल एक भूमि विवाद नहीं रह गया है, बल्कि प्रशासनिक आदेश, न्यायिक प्रक्रिया और राजस्व कानून की व्याख्या का ऐसा उदाहरण बन गया है, जिस पर कानूनी हलकों में भी चर्चा शुरू हो गई है।
आखिर क्या है पूरा मामला?
उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार पूरा विवाद चकिया तहसील क्षेत्र के मौजा तिलौरी स्थित आराजी संख्या-86 से जुड़ा है। इस भूमि पर स्वामित्व, कब्जा तथा उससे जुड़े अधिकारों को लेकर वर्ष 2019 से विवाद चला आ रहा था। शिकायतकर्ता लगातार यह दावा करता रहा कि उसे उसके वैध अधिकार के बावजूद वास्तविक कब्जा नहीं मिल पा रहा है। दूसरी ओर विवादित पक्ष अपने अधिकारों का दावा करता रहा, जिससे मामला केवल राजस्व अभिलेखों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि विभिन्न न्यायिक और प्रशासनिक मंचों तक पहुंच गया।
दस्तावेज बताते हैं कि इस दौरान कई बार प्रार्थना-पत्र दिए गए, राजस्व अधिकारियों के समक्ष सुनवाई हुई, अभिलेखों का परीक्षण हुआ और प्रशासनिक स्तर पर मामले का निस्तारण कराने के प्रयास किए गए। यही कारण रहा कि यह विवाद वर्षों तक लंबित रहा और स्थानीय स्तर पर चर्चा का विषय बना रहा।
फाइलों से निकलकर जमीन तक पहुंची कार्रवाई
करीब सात वर्षों तक विभिन्न स्तरों पर चली प्रक्रिया के बाद 30 जून 2026 का दिन इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण दिन साबित हुआ।
उपलब्ध अभिलेखों के अनुसार उपजिलाधिकारी (SDM) ने 30 जून को आदेश जारी करते हुए तहसीलदार एवं क्षेत्राधिकारी (CO) को संयुक्त रूप से आदेश का अनुपालन सुनिश्चित कराने के निर्देश दिए। आदेश के बाद राजस्व विभाग और पुलिस प्रशासन की संयुक्त टीम मौके पर पहुंची। प्रशासनिक अधिकारियों की निगरानी में कब्जा परिवर्तन की कार्रवाई कराई गई और पूरे घटनाक्रम के दौरान कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए पर्याप्त पुलिस बल तैनात रहा।
राजस्व विभाग का कहना है कि यह कार्रवाई किसी व्यक्तिगत निर्णय का परिणाम नहीं थी, बल्कि सक्षम अधिकारी द्वारा पारित आदेश के अनुपालन में की गई प्रशासनिक प्रक्रिया थी। प्रशासन का पक्ष है कि जब किसी सक्षम प्राधिकारी द्वारा आदेश पारित किया जाता है, तो उसका विधिसम्मत अनुपालन कराना राजस्व प्रशासन की जिम्मेदारी होती है और उसी दायित्व का निर्वहन किया गया।
तहसीलदार का पक्ष : ‘हमने केवल आदेश का अनुपालन कराया’
मामले में तहसीलदार का स्पष्ट पक्ष है कि पूरी कार्रवाई न्यायहित में तथा उपजिलाधिकारी के आदेश के अनुपालन में की गई। प्रशासन का कहना है कि राजस्व विभाग का दायित्व न्यायालय अथवा सक्षम राजस्व प्राधिकारी द्वारा पारित आदेशों को विधिक प्रक्रिया के अनुसार लागू कराना है। इसी क्रम में पुलिस प्रशासन की मौजूदगी में कब्जा परिवर्तन की कार्रवाई कराई गई।
प्रशासनिक सूत्रों का कहना है कि इस प्रकार की कार्रवाई में कानून-व्यवस्था बनाए रखना सबसे बड़ी प्राथमिकता होती है। इसलिए क्षेत्राधिकारी (CO) और पुलिस बल की मौजूदगी सुनिश्चित की गई ताकि किसी भी प्रकार का विवाद या अप्रिय स्थिति उत्पन्न न हो।
यहीं से शुरू हुआ विवाद का दूसरा अध्याय
हालांकि प्रशासनिक कार्रवाई पूरी होने के बाद मामला यहीं समाप्त नहीं हुआ। दूसरे पक्ष ने इस कार्रवाई पर गंभीर आपत्ति दर्ज कराई। डॉ. अरविंद पांडेय का कहना है कि संबंधित संपत्ति के संबंध में DRAT (Debts Recovery Appellate Tribunal), इलाहाबाद द्वारा पहले से Status Quo बनाए रखने का आदेश पारित किया गया था। उनका दावा है कि उस आदेश के रहते कब्जा परिवर्तन नहीं किया जाना चाहिए था।
डॉ. पांडेय का कहना है कि वे इस संबंध में उपलब्ध न्यायिक अभिलेखों के आधार पर आगे भी अपना पक्ष सक्षम मंच पर रखेंगे। दूसरी ओर प्रशासन का कहना है कि उसने उपजिलाधिकारी के आदेश का अनुपालन किया है।
क्या SDM का आदेश और DRAT का Status Quo आदेश आमने-सामने हैं? दस्तावेज़ों में क्या दर्ज है, समझिए पूरा घटनाक्रम
30 जून 2026 को प्रशासनिक कार्रवाई पूरी होने के बाद सबसे बड़ा सवाल यही उठा कि आखिर दूसरे पक्ष ने Debts Recovery Appellate Tribunal (DRAT), इलाहाबाद के Status Quo आदेश का हवाला क्यों दिया? क्या वास्तव में दोनों आदेशों में टकराव है, या दोनों अलग-अलग विधिक संदर्भों से जुड़े हैं? यही प्रश्न अब इस पूरे प्रकरण का सबसे महत्वपूर्ण कानूनी बिंदु बन गया है।
खबरी नेशनल न्यूज नेटवर्क द्वारा उपलब्ध दस्तावेजों के अध्ययन में यह सामने आया कि दूसरे पक्ष ने ट्रिब्यूनल के उस आदेश का उल्लेख किया है, जिसमें संबंधित संपत्ति के संबंध में यथास्थिति बनाए रखने की बात कही गई है। आदेश में पक्षकारों को संपत्ति की तत्कालीन स्थिति बनाए रखने का निर्देश दर्ज है। इसी आधार पर दूसरे पक्ष का कहना है कि प्रशासनिक कार्रवाई से पहले उस आदेश के विधिक प्रभाव पर विचार किया जाना चाहिए था।
हालांकि, उपलब्ध दस्तावेजों से यह भी स्पष्ट है कि 30 जून 2026 को उपजिलाधिकारी द्वारा पारित आदेश के आधार पर तहसीलदार और क्षेत्राधिकारी को संयुक्त रूप से कार्रवाई करने का निर्देश दिया गया और उसी आदेश का पालन करते हुए प्रशासन मौके पर पहुँचा। प्रशासन का पक्ष यही है कि उसने सक्षम प्राधिकारी के आदेश का अनुपालन किया।
प्रशासन का रुख : आदेश का पालन प्रशासनिक दायित्व
तहसील प्रशासन का स्पष्ट मत है कि जब सक्षम राजस्व प्राधिकारी द्वारा आदेश पारित किया जाता है, तो उसका अनुपालन कराना प्रशासन की जिम्मेदारी होती है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार 30 जून को SDM के निर्देश मिलने के बाद तहसीलदार और पुलिस प्रशासन ने संयुक्त रूप से मौके पर पहुँचकर कार्रवाई कराई।
प्रशासनिक अधिकारियों का कहना है कि ऐसी कार्रवाइयों में कानून-व्यवस्था बनाए रखना सर्वोच्च प्राथमिकता होती है। इसी कारण क्षेत्राधिकारी (CO) और पुलिस बल को भी साथ रखा गया, ताकि किसी प्रकार का तनाव या टकराव न हो।
यानी प्रशासन इस कार्रवाई को कानून-व्यवस्था बनाए रखते हुए आदेश के क्रियान्वयन के रूप में देख रहा है।
सात वर्षों का विवाद, एक दिन की कार्रवाई
इस पूरे प्रकरण का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि जिस कार्रवाई को 30 जून 2026 को अंजाम दिया गया, उसके पीछे लगभग सात वर्षों की राजस्व और प्रशासनिक प्रक्रिया रही। कई आवेदन, शिकायतें, अभिलेखीय परीक्षण और आदेशों के बाद मामला उस स्थिति तक पहुँचा जहाँ प्रशासन ने मौके पर जाकर आदेश का अनुपालन कराया।
यानी जो दृश्य 30 जून को लोगों ने देखा, वह किसी एक दिन का निर्णय नहीं था, बल्कि वर्षों से चल रही प्रशासनिक प्रक्रिया का परिणाम था।
खबरी नेशनल न्यूज नेटवर्क का विश्लेषण
दस्तावेज़ों और उपलब्ध तथ्यों के आधार पर तीन बातें स्पष्ट रूप से सामने आती हैं—
पहली, 30 जून 2026 को SDM द्वारा आदेश पारित किया गया और उसी दिन प्रशासन ने उसका अनुपालन कराया।
दूसरी, कब्जा परिवर्तन की कार्रवाई पुलिस और राजस्व अधिकारियों की संयुक्त मौजूदगी में हुई, जिससे यह स्पष्ट है कि प्रशासन ने इसे औपचारिक और नियंत्रित प्रक्रिया के रूप में अंजाम दिया।
तीसरी, दूसरे पक्ष ने DRAT के Status Quo आदेश का हवाला देते हुए कार्रवाई पर आपत्ति दर्ज की है। यह आपत्ति अब भविष्य में किसी न्यायिक परीक्षण का विषय बन सकती है।
अब आगे क्या?
इस मामले की अगली दिशा इस बात पर निर्भर करेगी कि क्या दूसरे पक्ष द्वारा किसी सक्षम न्यायालय या अधिकरण में इस कार्रवाई को चुनौती दी जाती है, और यदि ऐसा होता है तो न्यायालय उपलब्ध सभी आदेशों, अभिलेखों और तथ्यों का परीक्षण कर क्या निष्कर्ष निकालता है।
फिलहाल उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर इतना स्पष्ट है कि प्रशासन ने SDM के आदेश का अनुपालन किया, जबकि दूसरे पक्ष ने उस कार्रवाई पर DRAT के आदेश का हवाला देते हुए आपत्ति जताई है।
दस्तावेज़ क्या कहते हैं?
खबरी नेशनल न्यूज नेटवर्क द्वारा अध्ययन किए गए उपलब्ध दस्तावेज़ों से निम्न तथ्य सामने आते हैं—
- भूमि विवाद कई वर्षों से लंबित था।
- विवाद के दौरान विभिन्न स्तरों पर शिकायतें, आवेदन और प्रशासनिक पत्राचार हुआ।
- 30 जून 2026 को SDM ने तहसीलदार एवं क्षेत्राधिकारी को संयुक्त रूप से आदेश का अनुपालन सुनिश्चित करने का निर्देश दिया।
- उसी दिन प्रशासन ने पुलिस की मौजूदगी में कब्जा परिवर्तन की कार्रवाई कराई।
- दूसरे पक्ष ने DRAT के Status Quo आदेश का हवाला देते हुए इस कार्रवाई पर आपत्ति जताई।
इन तथ्यों से आगे का निष्कर्ष न्यायिक प्रक्रिया पर निर्भर करेगा।
राजस्व प्रशासन की भूमिका क्यों महत्वपूर्ण मानी जाती है?
भूमि विवादों में राजस्व प्रशासन की भूमिका केवल आदेश पारित करने तक सीमित नहीं होती, बल्कि उसका वास्तविक दायित्व आदेशों का शांतिपूर्ण और विधिसम्मत अनुपालन सुनिश्चित करना भी होता है। यही कारण है कि संवेदनशील मामलों में पुलिस बल की मौजूदगी में कार्रवाई कराई जाती है ताकि कानून-व्यवस्था बनी रहे और किसी प्रकार का टकराव न हो।
इस प्रकरण में भी प्रशासन का कहना है कि पुलिस और राजस्व विभाग की संयुक्त कार्रवाई का उद्देश्य केवल आदेश का सुरक्षित एवं शांतिपूर्ण अनुपालन सुनिश्चित करना था।
आदेश का अनुपालन हुआ, लेकिन कानूनी बहस जारी है
चकिया का यह बहुचर्चित भूमि विवाद 30 जून 2026 को प्रशासनिक कार्रवाई के साथ एक महत्वपूर्ण पड़ाव पर पहुँचा। प्रशासन का कहना है कि उसने उपजिलाधिकारी के आदेश का विधिसम्मत अनुपालन करते हुए पुलिस की मौजूदगी में कब्जा दिलाया। दूसरी ओर, दूसरे पक्ष ने DRAT के Status Quo आदेश का हवाला देते हुए कार्रवाई पर सवाल उठाए हैं।
फिलहाल यह स्पष्ट है कि प्रशासनिक कार्रवाई पूरी हो चुकी है, जबकि कानूनी विवाद अभी समाप्त नहीं माना जा सकता। यदि मामला आगे न्यायिक मंच पर जाता है, तो वहीं यह तय होगा कि दोनों पक्षों के दावों और उपलब्ध आदेशों की विधिक स्थिति क्या है।
सम्पादक की कलम से- DISCLAIMER
पीड़ित प्रभात गर्ग द्वारा माननीय मण्डलायुक्त वाराणसी व उपजिलाधिकारी चकिया के समक्ष प्रस्तुत विधिक प्रार्थना पत्रों, न्यायालय सिविल जज (सीनियर डिवीजन) चन्दौली, डीआरटी इलाहाबाद के आदेशों (अर्थदण्ड ₹25000) तथा 119 पृष्ठों के आधिकारिक सरकारी संलग्नकों के अध्ययन पर आधारित है। खबरी नेशनल न्यूज़ नेटवर्क किसी भी पक्ष के दावों की अंतिम विधिक सत्यता का दावा नहीं करता; इसका निर्धारण पूर्णतः सक्षम न्यायालय का विषय है। यदि इस प्रकरण में तत्कालीन तहसीलदार देवेन्द्र प्रताप सिंह, कोतवाल अर्जुन सिंह, वर्तमान प्रशासन अथवा विपक्षी पक्ष द्वारा कोई अन्य आधिकारिक प्रतिवाद या स्पष्टीकरण प्रस्तुत किया जाता है, तो उसे भी निष्पक्ष पत्रकारिता के तहत समान प्रमुखता से स्थान दिया जाएगा।























