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नायब तहसीलदार आरिफ के ऐतिहासिक फैसले से पूरे चंदौली में हलचल, राजस्व निरीक्षक के एक दर्जन आदेश निरस्त
“न दबाव चला, न प्रभाव चला… आखिर जीत हुई दस्तावेजों, कानून और न्याय की”
खबरी न्यूज विशेष रिपोर्ट
संपादक: के.सी. श्रीवास्तव (एडवोकेट)
चंदौली जिले के शहाबगंज न्यायालय से निकला एक फैसला आज पूरे जिले में चर्चा का विषय बना हुआ है। कटवा माफी गांव स्थित श्रीरामचन्द्र मंदिर एवं विष्णु मंदिर की लगभग 60 बीघा दानशुदा भूमि को लेकर 81 वर्षों से चल रहे विवाद में ऐसा आदेश आया है जिसने कथित कब्जेदारों की नींद उड़ा दी है।

नायब तहसीलदार शहाबगंज आरिफ ने अपने ऐतिहासिक आदेश में फर्जी तरीके से दर्ज की गई वरासत को निरस्त करते हुए भूमि को पुनः मंदिर के नाम दर्ज करने का निर्देश दिया है। इसके साथ ही राजस्व निरीक्षक द्वारा पारित लगभग एक दर्जन आदेश भी निरस्त कर दिए गए हैं।
आखिर क्या था पूरा मामला?
कटवा माफी गांव में स्थित श्रीरामचन्द्र मंदिर और विष्णु मंदिर की भूमि वर्ष 1945 में दानदाता रामस्वरूप सिंह द्वारा धार्मिक कार्यों, पूजा-पाठ, मंदिर संचालन और जनकल्याण के उद्देश्य से समर्पित की गई थी।
दानपत्र में स्पष्ट लिखा गया था कि भूमि से प्राप्त आय मंदिर और धार्मिक कार्यों में खर्च होगी। लेकिन समय के साथ इस दानशुदा भूमि पर कुछ लोगों के नाम वरासत में दर्ज हो गए।
वर्षों तक यह मामला अभिलेखों और फाइलों में दबा रहा।

ग्राम प्रधान सुनीता देवी द्वारा न्यायालय में आपत्ति प्रस्तुत किए जाने के बाद पूरे मामले की सुनवाई शुरू हुई।

कोर्ट में खुली फर्जी वरासत की परतें
न्यायालय ने पुराने दानपत्र, खतौनी, राजस्व अभिलेख, वाद पत्र, आपत्तियां तथा उपलब्ध साक्ष्यों का गहन परीक्षण किया।

जांच में सामने आया कि मंदिर की दानशुदा भूमि पर दर्ज की गई वरासत मूल दानपत्र की भावना और कानूनी व्यवस्था के अनुरूप नहीं थी।
इसके बाद न्यायालय ने विवादित वरासत को निरस्त कर दिया।
पूरे इलाके में चर्चा का विषय बने नायब तहसीलदार आरिफ
फैसले के बाद सबसे अधिक चर्चा नायब तहसीलदार शहाबगंज आरिफ की हो रही है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि वर्षों से चले आ रहे इस संवेदनशील मामले में कई तरह की चर्चाएं और दबाव की बातें होती रहीं, लेकिन न्यायालय ने केवल कानून, दस्तावेज और साक्ष्यों के आधार पर फैसला सुनाया।
लोगों का कहना है कि प्रशासनिक अधिकारी की असली पहचान उसकी निष्पक्षता और ईमानदारी से होती है, और इस फैसले ने उसी सिद्धांत को मजबूत किया है।
अब शुरू होगी बेदखली की प्रक्रिया
सूत्रों के अनुसार न्यायालय के आदेश के बाद राजस्व विभाग की अगली कार्रवाई पर सभी की निगाहें टिकी हुई हैं।
यदि भूमि पर अवैध कब्जे की पुष्टि होती है तो संबंधित राजस्व प्रावधानों के तहत बेदखली की कार्रवाई की जा सकती है।
ग्रामीणों का कहना है कि अब वर्षों से चला आ रहा विवाद समाप्त होने की दिशा में बढ़ चुका है।
करोड़ों की वसूली की भी चर्चा
राजस्व विशेषज्ञों के अनुसार यदि किसी दानशुदा भूमि का लंबे समय तक निजी उपयोग या कब्जा सिद्ध होता है तो नियमानुसार क्षतिपूर्ति और अन्य देयताओं का निर्धारण किया जा सकता है।
हालांकि अंतिम निर्णय सक्षम राजस्व अधिकारियों द्वारा विधिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही लिया जाएगा।
इसी कारण पूरे क्षेत्र में करोड़ों रुपये की संभावित वसूली को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं।
क्या अब बनेगा भव्य श्रीराम मंदिर?
फैसले के बाद श्रद्धालुओं में उत्साह का माहौल है।
ग्रामीणों का कहना है कि भूमि विवाद ही मंदिर के समुचित विकास में सबसे बड़ी बाधा था।
अब जब न्यायालय ने भूमि को पुनः मंदिर के नाम दर्ज करने का आदेश दिया है तो मंदिर परिसर के विकास, सौंदर्यीकरण और धार्मिक गतिविधियों के विस्तार का रास्ता पहले की तुलना में कहीं अधिक साफ दिखाई दे रहा है।
📜 आदेश की बड़ी बातें
✅ 81 वर्ष पुराने विवाद पर बड़ा फैसला
✅ मंदिर की लगभग 60 बीघा भूमि पर फर्जी वरासत निरस्त
✅ राजस्व निरीक्षक के एक दर्जन आदेश रद्द
✅ भूमि पुनः श्रीरामचन्द्र मंदिर एवं विष्णु मंदिर के नाम दर्ज करने का आदेश
✅ आगे की राजस्व कार्रवाई और बेदखली का रास्ता साफ
✅ पूरे जिले में फैसले की चर्चा
✍️ खबरी न्यूज विशेष
“जहां सच के सामने झुक गईं फाइलें, और 81 साल बाद न्याय ने दी दस्तक…”
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