चकिया तहसील में निरीक्षण तो हो गया… पर सवाल यह है कि पत्रकारों से क्यों नहीं मिले अपर आयुक्त प्रशासन सुभाष यादव? प्रशासन से संवाद की उम्मीद रखने वाले पत्रकारों को मिला सीधा इंकार — “ना फोटो, ना मुलाकात!”
क्या अफसरशाही अब जनता की आवाज़ से भी दूरी बनाने लगी है?
पढ़िए पूरी रिपोर्ट, सिर्फ खबरी पर।
चकिया (चंदौली)। शासन के निर्देशों के क्रम में अपर आयुक्त प्रशासन प्रथम सुभाष यादव ने रविवार को चकिया तहसील का औचक निरीक्षण किया। यह निरीक्षण 19 अप्रैल 2025 को प्रस्तावित था, किंतु अपर आयुक्त प्रशासन के कार्यक्रम में परिवर्तन के चलते यह मुआयना एक दिन बाद यानी रविवार 20 अप्रैल को सम्पन्न हुआ।
निरीक्षण के दौरान अपर आयुक्त सुभाष यादव के साथ स्टोन मुख्य आयुक्त प्रशासन के आदेश भी प्रभावी रूप से क्रियान्वित किए गए। निरीक्षण का मूल उद्देश्य तहसील कार्यालयों में चल रही न्यायिक, राजस्व, वसूली और प्रशासनिक कार्यवाहियों की हकीकत को परखना और व्यवस्थाओं का जायजा लेना था।
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निरीक्षण के दौरान संतोषजनक व्यवस्था
सुभाष यादव ने चकिया तहसील के विभिन्न कोर्ट और दफ्तरों जैसे न्यायालय नायब तहसीलदार, कोर्ट, नजारत ऑफिस, वसूली संग्रह आदि का गहन निरीक्षण किया। उन्होंने फाइलों की स्थिति, वादों की प्रगति, रिकॉर्ड संधारण, राजस्व संग्रहण की कार्यप्रणाली तथा कार्यालयी अनुशासन की समीक्षा की।
निरीक्षण के उपरांत अपर आयुक्त प्रशासन ने जताया संतोष
निरीक्षण के उपरांत अपर आयुक्त प्रशासन ने संतोष व्यक्त किया और कहा कि चकिया तहसील में प्रशासनिक प्रक्रिया संतुलित और व्यवस्थित रूप से संचालित हो रही है। कहीं कोई स्पष्ट अनियमितता या गड़बड़ी नहीं पाई गई।
पत्रकारों से मिलने से किया इनकार, मीडिया में नाराज़गी
निरीक्षण के बाद कुछ स्थानीय पत्रकारों ने अपर आयुक्त प्रशासन से भेंट करने की कोशिश की ताकि वे अपनी बात रख सकें और कुछ जमीनी मुद्दों को प्रशासन के संज्ञान में ला सकें। परंतु अपर आयुक्त प्रशासन सुभाष यादव ने पत्रकारों से मिलने से साफ इनकार कर दिया।
अपर आयुक्त ने स्पष्ट शब्दों में कहा, “मैं किसी भी मीडिया कर्मी से नहीं मिलूंगा और मेरी कोई भी फोटो या बयान प्रकाशित न किया जाए।”
इस रुख ने उपस्थित पत्रकारों को हैरत में डाल दिया। कई पत्रकारों ने नाराज़गी ज़ाहिर की और कहा कि यह प्रशासनिक पारदर्शिता के उसूलों के विपरीत है। जब प्रशासनिक अधिकारी जमीनी रिपोर्टिंग से कतराने लगें तो आम जनता की आवाज़ को कौन सुनेगा?
लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कैसे मजबूत होगा?
एक वरिष्ठ स्थानीय पत्रकार ने कहा, “हम सिर्फ संवाद करना चाहते थे। कोई विरोध या व्यक्तिगत एजेंडा नहीं था। अगर अधिकारी मीडिया से भी दूरी बना लेंगे तो लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कैसे मजबूत होगा ?”
जनता से जुड़ाव बनाम प्रशासनिक दूरी
अपर आयुक्त प्रशासन का यह रवैया कहीं न कहीं जनता से जुड़ाव की प्रक्रिया पर भी सवाल खड़ा करता है। जहां एक ओर शासन पारदर्शिता और संवाद को बढ़ावा देने की बात करता है, वहीं अधिकारी अगर संवाद से ही दूरी बना लें, तो यह लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में बाधा जैसा प्रतीत होता है।
अब आगे क्या?
चकिया तहसील का यह निरीक्षण जहाँ प्रशासनिक संतोष का विषय रहा, वहीं मीडिया से दूरी ने एक नई बहस को जन्म दे दिया है। यह देखना दिलचस्प होगा कि शासन स्तर पर इस मुद्दे को किस रूप में लिया जाता है।
जनसंवाद की पूरी प्रक्रिया को झटका
सरकारी निरीक्षणों का मूल उद्देश्य न केवल व्यवस्थाओं की समीक्षा करना है, बल्कि जनता और लोकतंत्र के विभिन्न स्तंभों के बीच संवाद को भी मज़बूत करना होता है। जब अधिकारी पत्रकारों को मिलने से मना करते हैं, तो यह केवल मीडिया को नहीं, बल्कि जनसंवाद की पूरी प्रक्रिया को झटका देता है।
अधिकारियों को चाहिए कि वे संवाद की शक्ति को समझें और उसे अपनाएं। चुप्पी से शासन नहीं चलता, जुड़ाव से चलता है।
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