“रोजी-रोटी बनाम ई-रजिस्ट्री की जंग: अधिवक्ता, टाइपिस्ट, स्टांप वेंडर और किसान एक मंच पर, प्रशासन को दी आर-पार की चेतावनी”
बार एसोसिएशन का बड़ा ऐलान—’ई-रजिस्ट्री नहीं रुकी तो तहसील में नहीं होने देंगे कोई रजिस्ट्री’
रिपोर्ट: के.सी. श्रीवास्तव (एडिटर-इन-चीफ), खबरी न्यूज
चकिया तहसील शुक्रवार को किसी आंदोलनकारी मैदान से कम नहीं दिखी। सब-रजिस्ट्रार कार्यालय के सामने सैकड़ों अधिवक्ताओं का गुस्सा उस समय फूट पड़ा जब ई-रजिस्ट्री व्यवस्था के विरोध में बार एसोसिएशन चकिया ने जोरदार धरना-प्रदर्शन शुरू कर दिया। पूरे परिसर में “ई-रजिस्ट्री वापस लो”, “अधिवक्ताओं का शोषण बंद करो”, “वादकारियों को न्याय दो” और “मुर्दाबाद-मुर्दाबाद” जैसे नारों की गूंज सुनाई देती रही।

धरना-प्रदर्शन का नेतृत्व बार एसोसिएशन चकिया के अध्यक्ष बृजेश सिंह एडवोकेट तथा महामंत्री अखिलेश श्रीवास्तव एडवोकेट कर रहे थे। अधिवक्ताओं ने एक स्वर में चेतावनी दी कि यदि ई-रजिस्ट्री व्यवस्था पर पुनर्विचार नहीं किया गया तो 22 जून से रजिस्ट्री संबंधी सभी कार्यों का पूर्ण बहिष्कार कर दिया जाएगा।
“ई-रजिस्ट्री नहीं, रोजगार पर सीधा हमला”
धरने को संबोधित करते हुए अध्यक्ष बृजेश सिंह एडवोकेट ने कहा कि ई-रजिस्ट्री व्यवस्था का सबसे बड़ा दुष्प्रभाव उन अधिवक्ताओं पर पड़ेगा जो वर्षों से रजिस्ट्री कार्य से जुड़े हुए हैं। उन्होंने कहा कि यह केवल अधिवक्ताओं की लड़ाई नहीं है बल्कि उन स्टांप वेंडरों, टाइपिस्टों और छोटे कर्मचारियों की भी लड़ाई है जिनकी आजीविका इसी व्यवस्था पर निर्भर है।
उन्होंने कहा कि डिजिटल व्यवस्था के नाम पर हजारों लोगों के रोजगार पर संकट खड़ा किया जा रहा है, जिसे किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं किया जाएगा।
महामंत्री अखिलेश श्रीवास्तव एड का बड़ा बयान
बार एसोसिएशन के महामंत्री अखिलेश श्रीवास्तव एडवोकेट ने कहा कि बार एसोसिएशन तकनीक का विरोध नहीं कर रही है, बल्कि ऐसी व्यवस्था का विरोध कर रही है जो लोगों की रोजी-रोटी छीनने का माध्यम बन जाए।

उन्होंने कहा—
“यदि ई-रजिस्ट्री व्यवस्था इसी प्रकार लागू की गई तो अधिवक्ता, स्टांप वेंडर, टाइपिस्ट और आम वादकारी सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे। हम जनता की आवाज उठा रहे हैं। यदि समय रहते समाधान नहीं निकाला गया तो 22 जून से आंदोलन और व्यापक होगा।”
किसान और वादकारी क्यों हैं सबसे ज्यादा परेशान?
धरने के दौरान अधिवक्ताओं ने आरोप लगाया कि ई-रजिस्ट्री के कारण सबसे ज्यादा परेशानी किसानों और ग्रामीण क्षेत्रों से आने वाले लोगों को हो रही है।

गांवों से आने वाले किसान सुबह से शाम तक कार्यालय में बैठकर अपनी बारी का इंतजार करते हैं, लेकिन तकनीकी कारणों और पोर्टल की समस्याओं के चलते उनका काम पूरा नहीं हो पाता।
नतीजा यह होता है कि उन्हें अगले दिन फिर आना पड़ता है।
यात्रा खर्च, मजदूरी का नुकसान, भोजन का खर्च और समय की बर्बादी—इन सबका बोझ आखिरकार आम जनता पर ही पड़ रहा है।
“कार्यालय में कौन सा इंटरनेट चल रहा है?”—जवाब ने खड़े कर दिए कई सवाल
धरने के दौरान जब खबरी न्यूज ने सब-रजिस्ट्रार से तकनीकी व्यवस्था को लेकर सवाल पूछे तो जवाबों ने नई बहस छेड़ दी।
सब-रजिस्ट्रार ने बताया कि पहले रेलवे नेटवर्क के माध्यम से कार्य होता था, लेकिन आंधी-पानी के बाद टावर प्रभावित होने के कारण निजी मोबाइल नेटवर्क से काम किया जा रहा है।
बातचीत के दौरान कभी निजी नेटवर्क का जिक्र हुआ तो कभी एयरटेल नेटवर्क का हवाला दिया गया।
अधिवक्ताओं ने सवाल उठाया कि यदि इंटरनेट व्यवस्था को लेकर ही स्पष्टता नहीं है तो जनता को समय पर और बेहतर सेवा कैसे मिलेगी?
“पोर्टल दिखाएगा तभी होगी रजिस्ट्री”
एक सवाल के जवाब में सब-रजिस्ट्रार ने कहा कि विभागीय पोर्टल पर प्रक्रिया दिखाई देने के बाद ही रजिस्ट्री की जा सकती है।
यही बयान अधिवक्ताओं के आक्रोश का एक बड़ा कारण बन गया।
अधिवक्ताओं का कहना था कि यदि पूरा सिस्टम केवल पोर्टल पर निर्भर रहेगा और पोर्टल समय पर काम नहीं करेगा तो आम जनता के हितों की रक्षा कैसे होगी?
पूर्व अध्यक्ष विजय यादव एड का गंभीर आरोप
धरने के दौरान बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष विजय यादव एडवोकेट ने एक चौंकाने वाला आरोप लगाया।
उन्होंने बताया कि उनके एक क्लाइंट द्वारा लगभग एक लाख रुपये जमा किए गए थे, लेकिन उसी दिन रजिस्ट्री नहीं हो सकी।
अगले दिन फिर से लगभग एक लाख रुपये जमा कराने पड़े।
उन्होंने आरोप लगाया कि पहले दिन जमा किया गया पैसा आज तक वापस नहीं मिला है। जिस पर सब रजिस्टार का कहना था कि वह पैसा वापसी के लिए उनके विभाग के उच्चाधिकारियों से सम्पर्क करे वे कुछ नही कर सकते।
इस दावे के बाद आंदोलन स्थल पर मौजूद लोगों में चर्चा तेज हो गई और कई लोगों ने व्यवस्था की पारदर्शिता पर सवाल उठाए।
22 जून को होगा निर्णायक संघर्ष?
धरना समाप्त होने के बाद भी अधिवक्ताओं का गुस्सा शांत नहीं हुआ।
बार एसोसिएशन ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यदि उनकी मांगों पर सकारात्मक निर्णय नहीं लिया गया तो 22 जून से रजिस्ट्री कार्य पूरी तरह प्रभावित होगा।
तहसील परिसर में चर्चा का विषय केवल एक ही था—क्या प्रशासन अधिवक्ताओं की मांगों को सुनेगा या चकिया में रजिस्ट्री व्यवस्था पूरी तरह ठप होने की स्थिति बनेगी?
✍️ सम्पादकीय दृष्टिकोण
के.सी. श्रीवास्तव एड० (एडिटर-इन-चीफ, खबरी न्यूज)
ई-रजिस्ट्री का उद्देश्य पारदर्शिता और सुविधा बढ़ाना है, लेकिन यदि कोई व्यवस्था जनता, किसानों, अधिवक्ताओं, स्टांप वेंडरों और टाइपिस्टों के लिए परेशानी का कारण बन जाए तो उसकी समीक्षा आवश्यक हो जाती है। चकिया में उठ रहे सवाल केवल अधिवक्ताओं के नहीं हैं, बल्कि उन हजारों लोगों के हैं जो अपनी जमीन-जायदाद के कार्यों के लिए रजिस्ट्री कार्यालय पर निर्भर हैं। डिजिटल व्यवस्था का स्वागत होना चाहिए, लेकिन उससे पहले यह सुनिश्चित होना चाहिए कि वह जनता का समय बचाए, रोजगार छीनने और परेशानी बढ़ाने का कारण न बने।
खबरी न्यूज की बड़ी बात
“ई-रजिस्ट्री पर चकिया में छिड़ी जंग अब केवल अधिवक्ताओं की नहीं रही… यह किसानों, वादकारियों, टाइपिस्टों और रोजगार से जुड़े हजारों परिवारों की लड़ाई बनती जा रही है। 22 जून अब सिर्फ एक तारीख नहीं, बल्कि पूरे विवाद का निर्णायक मोड़ बन चुकी है।”
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