चकिया में गूंजीं लोककाव्य की स्वर लहरियां,
आदित्य पुस्तकालय में सजी मासिक काव्य गोष्ठी, पूर्वांचल की लोकधारा और सामाजिक चेतना का दिखा अद्भुत संगम
खबरी न्यूज नेशनल नेटवर्क चकिया, चंदौली।
नगर के प्रतिष्ठित आदित्य पुस्तकालय, चकिया में रविवार को आयोजित चंद्रप्रभा साहित्यिक संस्था की मासिक काव्य गोष्ठी इस बार खास बन गई, जब यह आयोजन “राम जियावन दास बावला स्मृति काव्य समारोह” के रूप में संपन्न हुआ। कार्यक्रम में पूर्वांचल की लोकसंस्कृति, भोजपुरी साहित्य, सामाजिक चेतना और मानवीय मूल्यों की ऐसी त्रिवेणी बही कि पूरा सभागार साहित्यिक रसधारा में डूब गया। वरिष्ठ कवियों और साहित्यकारों ने अपने काव्य पाठ के माध्यम से स्वर्गीय राम जियावन दास बावला को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की।
कार्यक्रम का शुभारंभ वरिष्ठ साहित्यकार अमरनाथ पाल द्वारा प्रस्तुत भावपूर्ण वाणी वंदना “मैया मोरी भक्त खड़ा तेरे द्वार मां…” से हुआ। इस मंगलाचरण ने पूरे वातावरण को भक्तिमय बना दिया। इसके बाद उन्होंने बावला जी की स्मृति में उनकी चर्चित रचना प्रस्तुत की—
“केवट बोला रामचंद्र से कर जोरी मृदुवानी, ए बाबू राउर मरम हम जानु…”
जिसे सुनकर उपस्थित श्रोतागण भावविभोर हो उठे।

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बावला जी की स्मृतियों से भावुक हुआ सभागार
वरिष्ठ रचनाकार रंग बहादुर सिंह ‘रंग’ ने बावला जी के साथ बिताए संस्मरण साझा करते हुए कहा कि वे केवल कवि नहीं, बल्कि लोकजीवन की धड़कन थे। उन्होंने अपनी रचना—
“तू करतार कहा था, तू जगताधार कहां था…”
सुना कर सगुण और निर्गुण ब्रह्म की गूढ़ व्याख्या प्रस्तुत की।
राजेश विश्वकर्मा ‘राजू’ ने सामाजिक यथार्थ पर प्रहार करते हुए सुनाया—
“जाहि विधि राखे बाबा, वाही विधि रहिए, जानकर भी चोर को चोर मत कहिए…”
जिस पर श्रोताओं ने खूब तालियां बजाईं।
संस्था अध्यक्ष बेचई सिंह मालिक ने भोजपुरी लोकधारा में बावला जी की महत्ता को रेखांकित करते हुए कहा—
“सावला बावला जी रहलै लोहार हो, गढ़ देहलै अइसन गीत गावे संसार हो…”
उनकी यह प्रस्तुति समारोह का विशेष आकर्षण रही।

कविताओं में दिखी सामाजिक चेतना और व्यवस्था पर व्यंग्य
प्रदीप पाठक एडवोकेट ने वर्तमान सामाजिक विसंगतियों पर तीखा व्यंग्य करते हुए कहा—
“चोर को चोर कहिए न साहेब यहां, वरना ईमान बेमौत मर जाएगी…”
बंधु पाल ‘बंधु’ ने बावला जी की लोकप्रियता का उल्लेख करते हुए कहा—
“पूरे पूर्वांचल में डंका बजाय देहलै, भीषमपुर गांव क हमार बावला जी…”

आनंद माया मार्गदर्शक ने कर्मप्रधान जीवन का संदेश देते हुए कहा—
“कर कला का प्रदर्शन, ऐ कर्मभूमि है, स्वप्न से अब तो जागो, यह जन्मभूमि है…”
रामअवतार कवल ने गरीबी को जीवन का सबसे बड़ा अभिशाप बताते हुए बावला जी की स्मृतियों को जीवंत किया।
माता-पिता, समाज और राजनीति पर गूंजे काव्य स्वर
अलियार प्रधान ने माता-पिता के सम्मान पर आधारित अपनी रचना—
“माई कै चरनीया हो, बाबू कै चरनीया…”
सुना कर भावनात्मक माहौल बना दिया।
हरिवंश सिंह ‘बवाल’, राजेश बेनजीर, राजेश जगरिया, जगजीवन, रामप्रवेश जाऊं, संतोष कुमार धुर्त और मिथिलेश सिंह ने अपनी-अपनी रचनाओं से कार्यक्रम में सामाजिक सरोकार, पारिवारिक विघटन, भ्रष्टाचार, राजनीति और व्यवस्था की विडंबनाओं को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया।
विशेष रूप से संतोष कुमार धुर्त की व्यंग्यात्मक पंक्तियां—
“कभी कहना ना कि पुलिस दरोगा घूस खाते हैं, तुम्हारे पान पर बस थोड़ा सा चूना लगाते हैं…”
पर सभागार देर तक ठहाकों और तालियों से गूंजता रहा।
साहित्यिक चेतना को जीवित रखने का संकल्प
कार्यक्रम की अध्यक्षता रंग बहादुर सिंह ‘रंग’ ने की जबकि संचालन संतोष कुमार धुर्त ने शानदार अंदाज में किया। वक्ताओं ने कहा कि ऐसे आयोजन न केवल साहित्यिक परंपरा को जीवित रखते हैं बल्कि नई पीढ़ी को लोकसंस्कृति और मानवीय मूल्यों से जोड़ने का सशक्त माध्यम भी हैं।
समारोह के अंत में उपस्थित साहित्यकारों ने संकल्प लिया कि राम जियावन दास बावला की साहित्यिक विरासत को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने के लिए इस प्रकार के आयोजन निरंतर किए जाएंगे।
खबरी न्यूज के लिए यह आयोजन इस बात का प्रमाण है कि चकिया की धरती आज भी साहित्य, संस्कृति और लोककला की उर्वर भूमि है, जहां शब्द केवल लिखे नहीं जाते, बल्कि जिए जाते हैं।





















