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पिता : वह बरगद जिसकी छाया में पीढ़ियाँ पनपती हैं, और जिसके न रहने पर धूप का असली अहसास होता है

खबरी न्यूज सम्पादकीय

फादर्स डे विशेष

“पिता का महत्व उससे पूछिए, जिसे अब रोकने-टोकने वाला कोई नहीं बचा…”

✍️ डॉ. विनय कुमार वर्मा

जब जीवन के सबसे बड़े नायक की पहचान देर से होती है…

जीवन के विशाल रंगमंच पर अनेक किरदार आते हैं, कुछ तालियाँ बटोरते हैं, कुछ चर्चाओं में रहते हैं, लेकिन एक किरदार ऐसा होता है जो पर्दे के पीछे रहकर पूरी कहानी को सफल बनाता है—वह है पिता

पिता वह नाम नहीं, वह एक संपूर्ण व्यवस्था हैं। वह परिवार का संविधान हैं, अनुशासन हैं, सुरक्षा कवच हैं और वह मौन शक्ति हैं, जिनकी मौजूदगी में हमें कभी डर नहीं लगता। लेकिन विडंबना देखिए, जिनके होने से जीवन आसान होता है, उनकी अहमियत अक्सर तब समझ आती है जब वे हमारे बीच नहीं रहते।

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सच कहें तो पिता का महत्व उससे पूछिए, जिसके सिर पर अब कोई हाथ रखने वाला नहीं है, जिसे अब कोई रोकने-टोकने वाला नहीं है, जिसे देर रात घर आने पर कोई डांटने वाला नहीं है।

क्या कर सकता है पिता? नहीं… सवाल यह है कि क्या नहीं कर सकता?

समाज में अक्सर कहा जाता है कि “पिता अपने बच्चों के लिए बहुत कुछ कर सकता है।”

लेकिन यह वाक्य अधूरा है।

सही वाक्य यह होना चाहिए कि—

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“पिता अपने बच्चों के लिए क्या नहीं कर सकता?”

वह अपनी इच्छाएँ छोड़ सकता है।

वह अपने सपनों का गला घोंट सकता है।

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वह अपनी जरूरतों को मार सकता है।

वह अपनी खुशियों को टाल सकता है।

वह अपने शरीर की थकान छुपा सकता है।

वह अपने आँसू पी सकता है।

लेकिन अपने बच्चों की आँखों में निराशा नहीं देख सकता।

पिता का पूरा जीवन इसी संघर्ष में बीत जाता है कि उसके बच्चों को वह अभाव न झेलना पड़े जो उसने स्वयं झेला है।

वह बरगद जो कभी अपनी छाया का हिसाब नहीं मांगता

पिता बिल्कुल बरगद के वृक्ष की तरह होते हैं।

उनकी जड़ें जमीन में इतनी गहरी होती हैं कि आँधियाँ भी परिवार को हिला नहीं पातीं।

उनकी शाखाएँ इतनी विस्तृत होती हैं कि परिवार का हर सदस्य सुरक्षित महसूस करता है।

लेकिन किसी ने कभी बरगद से पूछा है कि वह खुद धूप में कितना झुलसता है?

नहीं।

ठीक वैसे ही जैसे कोई पिता से नहीं पूछता कि वह भीतर से कितना टूटा हुआ है।

बचपन में खलनायक, जवानी में पुराना विचार, और उम्र के साथ सबसे बड़ा नायक

बचपन में हमें लगता है कि पिता बहुत कठोर हैं।

वे हमारी हर जिद क्यों नहीं मानते?

वे हर बात पर टोकते क्यों हैं?

वे बार-बार समझाते क्यों हैं?

उस समय उनकी डांट हमें अन्याय लगती है।

लेकिन उम्र के साथ जब जीवन की ठोकरें लगती हैं, जब जिम्मेदारियाँ कंधों पर आती हैं, जब अपने बच्चों की चिंता सताने लगती है, तब एहसास होता है कि—

“पिता की डांट वास्तव में जीवन की ठोकरों से बचाने वाली ढाल थी।”

पिता का प्रेम दिखाई नहीं देता, महसूस होता है

माँ का प्रेम बहती हुई नदी की तरह दिखाई देता है।

लेकिन पिता का प्रेम समुद्र की तरह होता है।

वह शांत दिखता है, लेकिन उसकी गहराई का अंदाजा लगाना आसान नहीं।

पिता कभी यह नहीं कहते कि वे कितना प्रेम करते हैं।

वे यह भी नहीं बताते कि कितनी रातें जागकर उन्होंने बच्चों के भविष्य की चिंता की।

वे केवल अपने कर्तव्य निभाते जाते हैं।

और यही उनका प्रेम है।

घर का सबसे मजबूत व्यक्ति भी कभी-कभी रोता है

हमने अक्सर देखा है—

माँ रोती है तो पूरा घर देख लेता है।

बच्चे रोते हैं तो पूरा परिवार चिंतित हो जाता है।

लेकिन पिता रोते हैं तो अक्सर अकेले में रोते हैं।

क्योंकि उन्हें बचपन से सिखाया जाता है कि मजबूत लोग आँसू नहीं बहाते।

लेकिन सच्चाई यह है कि पिता भी इंसान होते हैं।

उनके भी सपने होते हैं।

उनकी भी इच्छाएँ होती हैं।

उन्हें भी दर्द होता है।

फर्क सिर्फ इतना है कि वे अपने दर्द को मुस्कान के पीछे छिपा लेते हैं।

बेटी की विदाई : पिता के जीवन की सबसे कठिन परीक्षा

शायद संसार का सबसे कठिन क्षण वह होता है जब एक पिता अपनी बेटी को विदा करता है।

वह मुस्कुराता है।

मेहमानों का स्वागत करता है।

सभी व्यवस्थाएँ संभालता है।

लेकिन उसके भीतर एक समुद्र टूट रहा होता है।

जिस बेटी की उंगली पकड़कर उसने चलना सिखाया, आज वही किसी और घर की हो रही होती है।

उस दिन पिता की आँखों में छिपे आँसू दुनिया की सबसे सच्ची कहानी लिखते हैं।

बेटे की सफलता में सबसे ज्यादा खुश कौन होता है?

जब बेटा या बेटी जीवन में सफल होते हैं, पुरस्कार प्राप्त करते हैं, बड़ा पद हासिल करते हैं—

तो सबसे ज्यादा गर्व पिता को होता है।

हो सकता है वह मंच पर जाकर गले न लगाए।

हो सकता है वह भावुक शब्द न बोले।

लेकिन उसके भीतर वर्षों का संघर्ष मुस्कुरा रहा होता है।

उसे लगता है कि उसकी तपस्या सफल हो गई।

आधुनिक युग में पिता की भूमिका और भी बढ़ गई है

आज तकनीक बहुत आगे बढ़ चुकी है।

मोबाइल हैं।

इंटरनेट है।

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस है।

लेकिन जीवन के मूल्य अब भी परिवार से ही मिलते हैं।

ईमानदारी, जिम्मेदारी, संघर्ष, धैर्य और आत्मसम्मान का पाठ कोई ऐप नहीं पढ़ा सकता।

यह पाठ आज भी पिता के आचरण से ही सीखा जाता है।

जब पिता नहीं रहते, तब समझ आता है कि जीवन में क्या खो गया

जीवन का सबसे बड़ा दुःख केवल किसी अपने को खोना नहीं होता।

सबसे बड़ा दुःख तब होता है जब पिता नहीं रहते और अचानक महसूस होता है कि अब पीछे खड़ा वह पर्वत नहीं रहा।

अब कोई यह पूछने वाला नहीं कि खाना खाया या नहीं।

अब कोई डांटने वाला नहीं।

अब कोई बिना बताए चिंता करने वाला नहीं।

तब समझ आता है कि पिता वास्तव में क्या थे।

तब उनकी हर बात याद आती है।

उनकी हर सीख अमूल्य लगने लगती है।

उनकी हर डांट प्रेम का दूसरा रूप दिखाई देने लगती है।

फादर्स डे केवल उत्सव नहीं, कृतज्ञता का अवसर है

फादर्स डे केवल सोशल मीडिया पर तस्वीर लगाने का दिन नहीं है।

यह उस तपस्या को प्रणाम करने का दिन है जो वर्षों तक बिना प्रशंसा के चलती रहती है।

यह उस व्यक्ति को धन्यवाद कहने का दिन है जिसने हमारे लिए अपने सपनों का त्याग किया।

यह उस हाथ को थामने का दिन है जिसने हमें गिरकर उठना सिखाया।

आइए आज पिता से कहें…

यदि आपके पिता आपके साथ हैं तो आज उनके पास बैठिए।

कुछ मिनट बात कीजिए।

उनकी आँखों में देखकर कहिए—

“पिताजी, आपने हमारे लिए जो किया, उसके लिए धन्यवाद।”

यकीन मानिए, यह वाक्य उनके लिए किसी पुरस्कार से कम नहीं होगा।

यदि माँ जीवन की कविता है, तो पिता उसका अर्थ हैं।

यदि माँ ममता का सागर है, तो पिता विश्वास का आकाश हैं।

यदि माँ घर की आत्मा है, तो पिता उसकी शक्ति हैं।

पिता वह बरगद हैं जिनकी छाया में पीढ़ियाँ पनपती हैं।

वे वह दीपक हैं जो स्वयं जलकर दूसरों को प्रकाश देते हैं।

वे वह मौन प्रार्थना हैं जो जीवन भर अपने बच्चों की खुशियों के लिए ईश्वर से संवाद करती रहती है।

और अंत में…

पिता है तो सब कुछ है।
पिता के होने का अर्थ ही सुरक्षा है।
पिता का महत्व उससे पूछिए, जिसे अब रोकने-टोकने वाला कोई नहीं बचा।

पिता को शत-शत नमन।

उनके त्याग को प्रणाम।

उनके प्रेम को कोटि-कोटि वंदन।

🙏

— डॉ. विनय कुमार वर्मा
विशेष सम्पादकीय | खबरी न्यूज 

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