चन्दौली में जागरूकता की अलख: किताबों से निकलकर ज़िंदगी के हक़ तक पहुंचा ‘कानून’!
खबरी न्यूज नेशनल नेटवर्क चन्दौली |

कभी-कभी बदलाव अदालतों के फैसलों से नहीं, बल्कि छोटे-छोटे जागरूकता शिविरों से शुरू होता है… और कुछ ऐसा ही नज़ारा आज चन्दौली में देखने को मिला, जहां कानून किताबों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सीधे युवाओं के दिल और दिमाग तक पहुंच गया।
जनपद न्यायालय के निर्देशन में जिला विधिक सेवा प्राधिकरण की पहल पर सेंट अभिषेक नर्सिंग एवं पैरामेडिकल इंस्टीट्यूट में एक दमदार विधिक जागरूकता शिविर आयोजित हुआ। इस शिविर की कमान संभाली सिविल जज (सीडी) व पूर्णकालिक सचिव निकिता गौड़ ने, जिनकी मौजूदगी ने पूरे माहौल को ऊर्जा और गंभीरता दोनों से भर दिया।
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“अपने हक जानो, तभी खुद को पहचानो”
शिविर में मौजूद पैरामेडिकल के छात्र-छात्राओं को सिर्फ कानून की जानकारी नहीं दी गई, बल्कि उन्हें यह एहसास कराया गया कि अधिकार सिर्फ किताबों में नहीं, जिंदगी में जीने के लिए होते हैं।
महिलाओं के अधिकार, सरकारी योजनाओं की सच्चाई और जमीनी लाभ, और महिला-बाल विकास में सरकार की भूमिका—इन सभी विषयों को बेहद सरल और प्रभावी अंदाज में समझाया गया। कई छात्राओं की आंखों में एक नई चमक दिखी, जैसे उन्हें पहली बार अपने अधिकारों की असली ताकत का एहसास हुआ हो।

कानून पहुंचा क्लासरूम में-धुआं सिर्फ फेफड़ों को नहीं, सपनों को भी जलाता है”
शिविर का एक और अहम पहलू रहा—स्वास्थ्य जागरूकता।
प्रवक्ताओं ने धूम्रपान और तंबाकू के खतरनाक असर पर खुलकर बात की। कैंसर जैसे गंभीर रोगों का जिक्र होते ही माहौल कुछ पल के लिए सन्नाटे में बदल गया। खासकर सर्वाइकल कैंसर और उसके बचाव को लेकर दी गई जानकारी ने छात्राओं को गहराई से सोचने पर मजबूर कर दिया।

कानून पहुंचा क्लासरूम में-“यह सिर्फ शिविर नहीं, एक मिशन है”
इस कार्यक्रम की सबसे खास बात रही—एक जिम्मेदारी का संचार।
हर छात्र-छात्रा से अपील की गई कि वे इस ज्ञान को सिर्फ अपने तक सीमित न रखें, बल्कि अपने गांव, कस्बे और शहर तक पहुंचाएं। यानी अब ये युवा खुद एक चलता-फिरता जागरूकता अभियान बन चुके हैं।
मंच संचालन ने बांधा समां
कार्यक्रम का संचालन पैनल अधिवक्ता महेंद्र प्रताप सिंह ने किया, जिन्होंने पूरे आयोजन को सहज, प्रभावी और रोचक बनाए रखा। उनकी शैली ने कार्यक्रम को कहीं भी बोझिल नहीं होने दिया।
खबरी वैरीडेट
चन्दौली में हुआ यह आयोजन सिर्फ एक सरकारी औपचारिकता नहीं था, बल्कि यह एक सोशल मूवमेंट की शुरुआत जैसा लगा। जब युवा अपने अधिकारों को समझेंगे, तभी समाज में असली बदलाव आएगा।
आज का यह शिविर यह साबित करता है कि अगर सही दिशा और सही जानकारी मिल जाए, तो बदलाव की चिंगारी कहीं भी भड़क सकती है—चाहे वो एक छोटा सा कॉलेज ही क्यों न हो।


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