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5 साल का जख्म, 5 घंटे में मरहम! जब तहसीलदार ने खुद उठाया फावड़ा, टूट गई साम्प्रदायिकता की दीवार

“हिन्दू का पानी हिन्दू के खेत से, मुसलमान का पानी मुसलमान के खेत से जाएगा”… इस सोच पर चला प्रशासन का बुलडोजर, बच गई गंगा-जमुनी तहजीब

चकिया के तहसीलदार देवेन्द्र जी और पुलिस टीम ने कर दिखाया वो काम, जो 5 साल में नहीं हो पाया था

खबरी न्यूज | विशेष रिपोर्ट के सी श्रीवास्तव एड एडिटर इन चीफ 

चंदौली जनपद की चकिया तहसील के शाहबगंज ब्लॉक अंतर्गत तकिया महरौर गांव में बीते पांच वर्षों से सुलग रही एक ऐसी समस्या थी, जो केवल जल निकासी का विवाद नहीं रह गई थी। धीरे-धीरे उसे साम्प्रदायिक रंग देने की कोशिशें भी शुरू हो गई थीं। गांव दो हिस्सों में बंटता दिखाई दे रहा था। नालियों का पानी खेतों तक नहीं पहुंच पा रहा था, घरों में भर रहा था, दीवारें दरक रही थीं और एक परिवार का आशियाना गिरने की कगार पर पहुंच चुका था।

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लेकिन रविवार को जो हुआ, उसने प्रशासनिक कार्यशैली की एक नई मिसाल कायम कर दी।

यह कहानी केवल पानी निकासी की नहीं है, बल्कि यह कहानी है प्रशासनिक इच्छाशक्ति, पुलिस की सक्रियता और हिन्दू-मुस्लिम एकता की उस मिसाल की, जिसने पांच साल पुराने विवाद को जड़ से खत्म कर दिया।

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जब विवाद पानी का नहीं, सोच का बन गया

गांव में चर्चा थी कि कुछ लोग यह तर्क दे रहे थे कि—

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“हिन्दू का पानी हिन्दू के खेत से जाएगा और मुसलमान का पानी मुसलमान के खेत से जाएगा।”

यही सोच धीरे-धीरे विवाद को खतरनाक दिशा में ले जा रही थी। जल निकासी का सामान्य मामला साम्प्रदायिक तनाव का रूप लेने लगा था।

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सबसे अधिक परेशानी झेल रहा था साहनी परिवार।

महेन्द्र पुत्र फौजी और चन्द्रिका साहनी पुत्र श्यामलाल (जो गांव के चौकीदार भी हैं) के क्षेत्र में जलभराव लगातार बढ़ता गया। स्थिति इतनी गंभीर हो गई कि रागिनी साहनी का मकान गिरने की कगार पर पहुंच गया।

बारिश का पानी और नाली का बहाव घरों में भरता रहा, लेकिन समाधान कहीं नजर नहीं आ रहा था।

तब मैदान में उतरे तहसीलदार देवेन्द्र जी

जब मामला लगातार उलझता गया तो चकिया तहसील प्रशासन ने इसे चुनौती के रूप में लिया।

तहसीलदार देवेन्द्र जी ने पूरे प्रकरण का स्वयं संज्ञान लिया।

केवल आदेश देने तक सीमित रहने के बजाय उन्होंने मौके पर पहुंचकर खुद कमान संभाली।

उनके साथ पूरी तहसील मशीनरी मौजूद रही।

✅ 18 लेखपाल

✅ दो थाना प्रभारी

✅ भारी पुलिस बल

✅ राजस्व विभाग की पूरी टीम

गांव वालों ने शायद पहली बार देखा कि कोई अधिकारी सिर्फ कुर्सी पर बैठकर निर्देश नहीं दे रहा, बल्कि जमीन पर उतरकर समाधान करा रहा है।

सबसे भावुक दृश्य… जब अधिकारियों ने खुद चलाया फावड़ा

गांव के लोग उस दृश्य को शायद वर्षों तक नहीं भूल पाएंगे।

जहां आमतौर पर अधिकारी निरीक्षण करते दिखाई देते हैं, वहीं यहां तहसीलदार देवेन्द्र जी और थाना प्रभारी स्वयं फावड़ा लेकर अवरोध हटाने में जुट गए।

मिट्टी काटी गई। रास्ता साफ किया गया। जल निकासी का मार्ग बनाया गया।

और देखते ही देखते पांच साल से रुका पानी बहने लगा।

जैसे ही पानी आगे बढ़ा, लोगों के चेहरों पर भी राहत की लहर दौड़ गई।

महबूब ने दिखाई इंसानियत, गांव को दिया नया संदेश

इस पूरी कहानी का सबसे खूबसूरत और भावनात्मक अध्याय तब सामने आया जब गांव के महबूब आगे आए।

जहां कुछ लोग हिन्दू-मुस्लिम की दीवार खड़ी कर रहे थे, वहीं महबूब ने अपनी जमीन का हिस्सा जल निकासी के लिए देने का फैसला किया।

बस यहीं से कहानी बदल गई। न कोई हिन्दू बचा, न मुसलमान।

न कोई जाति रही, न कोई मजहब।रहा तो सिर्फ गांव और गांव का हित।

महबूब का यह कदम बताता है कि आज भी गांवों की मिट्टी में इंसानियत जिंदा है।

चौकीदार पर भी चला प्रशासन का डंडा

मामले की जांच और कार्रवाई के दौरान प्रशासन ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि सरकारी जिम्मेदारी निभाने में लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी।

सूत्रों के अनुसार चौकीदार चन्द्रिका साहनी की भूमिका को गंभीरता से लेते हुए तहसीलदार ने उनकी सेवा समाप्ति के लिए शासन को संस्तुति भेज दी है।

यह संदेश साफ है—

कानून सबके लिए बराबर है।

अब बह रहा पानी, खिल उठे चेहरे

जो पानी वर्षों से घरों और गलियों में ठहरा हुआ था, अब वह अपने रास्ते पर बह रहा है।

जो मकान गिरने के खतरे में थे, उन्हें राहत मिली है।

जो गांव विवाद की ओर बढ़ रहा था, वहां अब खुशी का माहौल है।

लोग प्रशासन की सराहना कर रहे हैं।

गांव में चर्चा है कि अगर इसी तरह अधिकारी जनता के बीच उतरकर काम करें तो बड़े से बड़ा विवाद भी खत्म हो सकता है।

साम्प्रदायिक ताकतों पर करारा तमाचा

तकिया महरौर की यह घटना केवल जल निकासी का समाधान नहीं है।

यह उन ताकतों के लिए करारा संदेश है जो हर छोटे विवाद में हिन्दू-मुस्लिम का जहर घोलने की कोशिश करती हैं।

यह घटना साबित करती है कि जब प्रशासन निष्पक्ष हो, पुलिस सजग हो और समाज के लोग आगे आएं, तो नफरत की राजनीति टिक नहीं सकती।

आज इस गांव ने पूरे जिले को संदेश दिया है कि—

पानी का कोई धर्म नहीं होता।
इंसानियत का कोई मजहब नहीं होता।
और विकास की कोई जाति नहीं होती।

✍️ खबरी न्यूज विशेष टिप्पणी

चकिया तहसील के तहसीलदार देवेन्द्र जी, मौके पर मौजूद थाना प्रभारियों, राजस्व टीम, 18 लेखपालों और सहयोगी ग्रामीणों ने जिस तरह पांच वर्षों से लंबित समस्या का समाधान कराया, वह प्रशासनिक संवेदनशीलता का उत्कृष्ट उदाहरण है। विशेष रूप से महबूब द्वारा भूमि देकर भाईचारे की मिसाल पेश करना समाज के लिए प्रेरणादायक है।

— के. सी. श्रीवास्तव (एडवोकेट)
Editor-in-Chief, Khabari News

“जहां फावड़ा चला प्रशासन का, वहां हार गई साम्प्रदायिकता… और जीत गई इंसानियत!”

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