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खबरी न्यूज विशेष खोजी श्रृंखला विधानसभा 383 चकिया भाग 3–मंडल बनाम कमंडल – कैसे बदली चकिया की राजनीति? (1989–2002)

चकिया विधानसभा (383): सत्ता का सिंहासन या जनता की अदालत?

भाग–3 : 

“1989… यह सिर्फ एक चुनाव नहीं था, बल्कि चकिया की राजनीति में एक नए युग की शुरुआत थी। जिस सीट पर वर्षों तक कांग्रेस का प्रभाव रहा, वहाँ अब नए चेहरे, नए दल और नए समीकरण उभरने लगे।”

जब चकिया ने बदल दिया अपना राजनीतिक मिजाज

1980 के दशक के अंत तक चकिया की राजनीति में कांग्रेस की पकड़ कमजोर पड़ने लगी थी। जनता के मुद्दे बदल रहे थे, राजनीतिक विचारधाराएँ बदल रही थीं और उत्तर प्रदेश की राजनीति एक बड़े मोड़ पर खड़ी थी।

1989 का चुनाव इस बदलाव का प्रतीक बन गया। पूरे प्रदेश में जनता दल का उभार हुआ और चकिया में सत्यप्रकाश सोनकर ने जनता दल के टिकट पर बड़ी जीत दर्ज की। उन्होंने कांग्रेस उम्मीदवार राम लखन को लगभग 39,800 मतों के अंतर से हराया, जो उस समय के हिसाब से एक बड़ी राजनीतिक जीत मानी गई।

SRVS Sikanderpur

मंडल की राजनीति और नई सामाजिक चेतना

1990 में मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने के निर्णय ने उत्तर प्रदेश की राजनीति को बदल दिया। पिछड़े और वंचित वर्गों की राजनीतिक भागीदारी तेजी से बढ़ी।

चकिया में भी इसका असर दिखा। चुनावी चर्चा अब केवल सड़क और बिजली तक सीमित नहीं रही। सामाजिक प्रतिनिधित्व, सम्मान और राजनीतिक हिस्सेदारी भी बड़े मुद्दे बन गए।

कमंडल की लहर और भाजपा का उभार

इसी दौर में राम मंदिर आंदोलन ने उत्तर प्रदेश की राजनीति को नई दिशा दी। भाजपा तेजी से उभरी और इसका असर चकिया पर भी पड़ा।

1991 विधानसभा चुनाव में भाजपा के राजेश कुमार ने जीत दर्ज की। यह केवल एक उम्मीदवार की जीत नहीं थी, बल्कि चकिया में भाजपा के मजबूत राजनीतिक प्रवेश का संकेत था।

Dalimss Sunbeam Chakia

1993: 369 वोट… जिसने इतिहास लिख दिया

यदि चकिया के सबसे रोमांचक चुनावों की बात हो, तो 1993 का चुनाव सबसे ऊपर आता है।
भाजपा के राजेश कुमार ने बसपा के नंदलाल को सिर्फ 369 मतों से हराया।
यह इतना करीबी मुकाबला था कि कई मतदान केंद्रों की गिनती पर सभी दलों की नजरें टिकी रहीं। यह चुनाव आज भी चकिया के सबसे दिलचस्प मुकाबलों में गिना जाता है।
1996: समाजवादी राजनीति की वापसी

1996 में राजनीतिक समीकरण फिर बदले।

सत्यप्रकाश सोनकर, इस बार समाजवादी पार्टी के टिकट पर मैदान में उतरे और उन्होंने लगभग 18 हजार मतों के अंतर से जीत दर्ज की।

Silver Bells Chakia

इस चुनाव ने यह साबित कर दिया कि चकिया का मतदाता किसी एक दल के साथ स्थायी रूप से नहीं जुड़ता, बल्कि परिस्थितियों और उम्मीदवारों के आधार पर फैसला करता है।

2002: भाजपा की वापसी

2002 में भाजपा ने शिवतपस्या पासवान को उम्मीदवार बनाया।

उन्होंने समाजवादी पार्टी के सत्यप्रकाश को लगभग 2,750 मतों से हराया।

यह चुनाव दिखाता है कि चकिया में मुकाबला लगातार त्रिकोणीय और प्रतिस्पर्धी होता जा रहा था। भाजपा, सपा और बसपा—तीनों ने अपना-अपना जनाधार बना लिया था।

इस दौर के सबसे प्रभावशाली चेहरे

सत्यप्रकाश सोनकर

  • 1989 में जनता दल से जीत।
  • 1996 में समाजवादी पार्टी से जीत।
  • दल बदल के बावजूद व्यक्तिगत राजनीतिक प्रभाव बनाए रखा।

राजेश कुमार

  • 1991 और 1993 में लगातार भाजपा विधायक।
  • चकिया में भाजपा के शुरुआती मजबूत नेताओं में गिने जाते हैं।

शिवतपस्या पासवान

  • 2002 में भाजपा को महत्वपूर्ण जीत दिलाई।
  • दलित नेतृत्व के रूप में उभरे।

इस दौर की सबसे बड़ी सीख

1989 से 2002 के बीच चकिया ने तीन बड़े संदेश दिए—

  • कांग्रेस का एकाधिकार समाप्त हो गया।
  • भाजपा, सपा और बाद में बसपा स्थायी राजनीतिक ताकत बन गईं।
  • मतदाता ने बार-बार यह दिखाया कि वह सत्ता बदलने से नहीं हिचकता।

अब कहानी और भी दिलचस्प होगी…

साल 2007

उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी ने “सामाजिक इंजीनियरिंग” का नया प्रयोग किया।

क्या उसकी लहर चकिया तक पहुँची?

कैसे पहली बार बसपा ने यह सीट जीती?

और फिर 2012 में समाजवादी पार्टी तथा 2017–2022 में भाजपा ने कैसे वापसी की

चकिया विधानसभा (383) का सम्पूर्ण चुनावी इतिहास (1952–2022)

चकिया विधानसभा उत्तर प्रदेश के चंदौली जनपद की महत्वपूर्ण सीट है। यह अनुसूचित जाति (SC) आरक्षित सीट है। वर्ष 2008 के परिसीमन के बाद इसका विधानसभा क्रमांक 223 से बदलकर 383 कर दिया गया। वर्तमान में यह राबर्ट्सगंज लोकसभा क्षेत्र का हिस्सा है।

अब तक के विधायक

वर्ष विजेता पार्टी
1962 राम लखन कांग्रेस
1967 बेचन राम संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी
1969 राम लखन कांग्रेस
1974 बेचन राम कांग्रेस
1977 श्याम देव जनता पार्टी
1980 खरपत राम कांग्रेस (आई)
1985 खरपत राम कांग्रेस
1989 सत्यप्रकाश सोनकर जनता दल
1991 राजेश कुमार भाजपा
1993 राजेश कुमार भाजपा
1996 सत्यप्रकाश सोनकर समाजवादी पार्टी
2002 शिवतपस्या पासवान भाजपा
2007 जितेंद्र कुमार बसपा
2012 पूनम सोनकर समाजवादी पार्टी
2017 शारदा प्रसाद भाजपा
2022 कैलाश खरवार भाजपा

2002 के बाद विस्तृत चुनाव परिणाम

वर्ष विजेता पार्टी मत उपविजेता अंतर
2022 कैलाश खरवार भाजपा 97,812 जितेंद्र कुमार (सपा) 9,251
2017 शारदा प्रसाद भाजपा 96,890 जितेंद्र कुमार (बसपा) 20,063
2012 पूनम सोनकर सपा 91,285 जितेंद्र कुमार (बसपा) 8,682
2007 जितेंद्र कुमार बसपा 48,655 सत्यप्रकाश सोनकर (सपा) 2,991
2002 शिवतपस्या पासवान भाजपा 46,346 सत्यप्रकाश (सपा) 2,750

पार्टीवार प्रदर्शन

  • भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) – 5 बार (1991, 1993, 2002, 2017, 2022)
  • कांग्रेस – 5 बार (1962, 1969, 1974, 1980, 1985)
  • समाजवादी पार्टी – 2 बार (1996, 2012)
  • बहुजन समाज पार्टी – 1 बार (2007)
  • जनता दल – 1 बार (1989)
  • जनता पार्टी – 1 बार (1977)
  • संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी – 1 बार (1967)

राजनीतिक विश्लेषण

  • 1962–1985: कांग्रेस का मजबूत प्रभाव।
  • 1989–2007: जनता दल, भाजपा, सपा और बसपा के बीच लगातार सत्ता परिवर्तन।
  • 2012: सपा ने पूनम सोनकर के साथ जीत दर्ज की।
  • 2017 और 2022: भाजपा ने लगातार दो चुनाव जीतकर सीट पर मजबूत पकड़ बनाई।

वर्तमान स्थिति (2026)

  • वर्तमान विधायक: कैलाश खरवार (भाजपा)
  • मुख्य मुकाबला भाजपा और समाजवादी पार्टी के बीच माना जा रहा है।
  • बसपा का पारंपरिक दलित आधार अभी भी कुछ क्षेत्रों में प्रभाव रखता है, लेकिन पहले जैसा नहीं है।
  • प्रमुख चुनावी मुद्दे: सड़क, सिंचाई, रोजगार, वनाधिकार, शिक्षा, स्वास्थ्य, बिजली और पेयजल।

यदि आप पत्रकारिता या चुनावी विश्लेषण के लिए सामग्री तैयार कर रहे हैं, तो मैं “चकिया विधानसभा 2027: जातीय समीकरण, बूथवार वोट बैंक, प्रमुख दावेदार, जीत-हार का गणित और किस पार्टी की कितनी संभावना” पर 3000–5000 शब्दों की विस्तृत विशेष रिपोर्ट भी तैयार कर सकता हूँ

अगला भाग (भाग–4):

“बसपा की दस्तक, सपा की वापसी और भाजपा का वर्चस्व (2007–2022): चकिया के तीन सबसे निर्णायक चुनाव” देखना सुनना न भूलें। 

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