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*डेरवा-बलुआ की धरती पर गरजा हिंदुत्व का शंखनाद,

खबरी न्यूज नेशनल नेटवर्क चहनिया (चंदौली)।
गुरुवार की दोपहर डेरवा-बलुआ गांव की धरती किसी साधारण आयोजन की गवाह नहीं बनी, बल्कि वह साक्षी बनी उस ज्वालामुखी की, जो वर्षों से हिंदू समाज के भीतर सुलग रहा था। मंच पर जब अंतरराष्ट्रीय हिंदू परिषद के संस्थापक डॉ. प्रवीण भाई तोगड़िया खड़े हुए, तो शब्द नहीं—इतिहास बोल रहा था, संघर्ष बोल रहा था और बलिदान की गूंज चारों दिशाओं में फैल रही थी।

करीब 11 बजे शुरू हुए इस कार्यकर्ता सम्मेलन में सैकड़ों की संख्या में कार्यकर्ता, ग्रामीण, बुजुर्ग, युवा और महिलाएं मौजूद रहीं। भगवा ध्वज, जय श्रीराम के उद्घोष और राष्ट्रवादी नारों के बीच पूरा माहौल ऊर्जा, आक्रोश और संकल्प से भरा हुआ था।

SRVS Sikanderpur

“राम मंदिर किसी सरकार की देन नहीं, यह 32 वर्षों के संघर्ष की जीत है”

अपने ओजस्वी और भावनात्मक संबोधन में डॉ. तोगड़िया ने कहा—

“राम मंदिर किसी सत्ता की कृपा नहीं है। यह उन करोड़ों हिंदुओं की जीत है जिन्होंने अपमान सहा, लाठियां खाईं, गोलियां झेलीं और फिर भी पीछे नहीं हटे।”

उन्होंने राम मंदिर आंदोलन के इतिहास को क्रमबद्ध तरीके से रखते हुए कहा कि 1979 में राम मंदिर की हुंकार उठी, लेकिन तत्कालीन सरकारें हिंदू समाज की मांगों को लगातार दबाती रहीं।
1990 में जब हिंदू संगठनों ने निर्णायक लड़ाई का ऐलान किया, तब सरकार को मजबूर होकर आधी रात में शिलान्यास की अनुमति देनी पड़ी।

न्यायालय, पुरातत्व और सच्चाई की जीत

डॉ. तोगड़िया ने कहा कि मामला न्यायालय पहुंचा, जहां यह तर्क दिया गया कि मंदिर कहीं भी बन सकता है।
लेकिन प्रश्न मंदिर का नहीं, राम जन्मभूमि का था।

उन्होंने बताया कि माननीय न्यायालय के निर्देश पर कनाडा की एक विशेषज्ञ कंपनी से उस स्थल की वैज्ञानिक जांच कराई गई, जिसके बाद पुरातत्व विभाग की खुदाई में मंदिर के अवशेष, स्तंभ और प्रमाण सामने आए।
यहीं से सत्य की जीत तय हो गई।

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“हम सरकार से एक पैसा नहीं लेंगे” — जनआंदोलन की मिसाल

डॉ. तोगड़िया ने गर्व के साथ कहा—

“हमने तय किया कि राम मंदिर के लिए सरकार से एक रुपया भी नहीं लिया जाएगा।”

इसके बाद राम मंदिर न्यास समिति के नाम से ट्रस्ट का गठन किया गया।
देशभर के 8 करोड़ हिंदू परिवारों ने सवा रुपये का चंदा दिया।
इसी जनसहयोग से 60 हजार घन मीटर पत्थर तराशे गए और 32 वर्षों के संघर्ष के बाद वही पत्थर आज भव्य राम मंदिर के रूप में स्थापित हैं।

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वीर कारसेवकों का भावुक सम्मान

सम्मेलन का सबसे भावुक क्षण तब आया जब मंच पर रणजीत यादव, राजेंद्र पाण्डेय और परशुराम सिंह को बुलाया गया।
ये वही कारसेवक हैं, जो राम मंदिर आंदोलन के दौरान सीने पर गोली खाने के इरादे से आगे बढ़े थे।

डॉ. तोगड़िया ने उन्हें माला पहनाई, मुंह मीठा कराया और कहा—

“आज अगर राम मंदिर खड़ा है, तो उसके असली हकदार यही वीर हैं।”

उन्होंने उस दौर को याद करते हुए कहा कि किस तरह तानाशाही सरकार ने गोलियां चलाईं, पानी की बौछारें छोड़ीं, लाठियां बरसाईं, लेकिन कारसेवक डटे रहे।
उन्होंने बाबरी ढांचे की एक-एक ईंट को मिट्टी में मिला दिया, क्योंकि उनके भीतर राम का संकल्प था।

इतिहास से चेतावनी और भविष्य का संदेश

डॉ. तोगड़िया ने अपने भाषण में हिंदू समाज को चेताते हुए कहा—

“दो हजार वर्ष पहले न कोई क्रिश्चियन था, न कोई मुस्लिम। हिंदुओं को तोड़कर ही इन पहचानों को गढ़ा गया।”

उन्होंने कहा कि यदि आज हिंदू समाज नहीं जागा, संगठित नहीं हुआ, तो आने वाला समय भयावह होगा।
यह भाषण केवल इतिहास नहीं था, बल्कि भविष्य के लिए चेतावनी भी था।

हनुमान चालीसा से स्वास्थ्य, सुरक्षा और संगठन

सम्मेलन के अंतिम चरण में डॉ. तोगड़िया ने समाज को निरोग और संगठित रखने का सरल उपाय बताया।
उन्होंने कहा—

  • हर घर में प्रतिदिन सायंकाल हनुमान चालीसा का पाठ हो
  • हर मंगलवार और शनिवार को मंदिरों में 10–15 लोग सामूहिक पाठ करें

इससे हिंदू परिवार सुरक्षित, संगठित और मानसिक रूप से मजबूत रहेगा।

हिंदुत्व की चेतना से भरा सम्मेलन

कार्यक्रम के अंत में डॉ. तोगड़िया ने वीर महंत अवैद्यनाथ, विनय कटियार, साध्वी ऋतंभरा, अशोक सिंघल, परमहंस रामचंद्र दास सहित लाखों कारसेवकों को नमन करते हुए कहा कि उनका बलिदान कभी भुलाया नहीं जा सकता।

इनकी रही प्रमुख उपस्थिति

सम्मेलन में प्रमुख रूप से
सूर्यमुनी तिवारी, राजेंद्र पाण्डेय, दीना नाथ पाण्डेय, रणजीत यादव, वृक्ष बंधु डा० परशुराम सिंह, रामप्यारे पाण्डेय, कलेश्वर पाण्डेय, सहित तमाम लोग मौजूद रहे।

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